Skip to content
SarvaKosh
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 73 of 479

Read in context
Page 73

नङ्गलीश ] ५३
क्यों बैठा है ?" "आचार्य्य ! चारपाई के पाये का सहारा न मिलने से,
जांघ में धरके बैठा हूँ ।"
बोधिसत्व का दिल भर आया । वे सोचने लगे यह मेरी बहुत सेवा
करता है । लेकिन इतने विद्यार्थियों में यही मन्दमति है, शिल्प नहीं सीख
सकता । मैं इसे कैसे पण्डित बनाऊँ ? तब उन्हें सूझा—एक उपाय है ।
मैं इस विद्यार्थी को लकड़ियां और पत्ते लेने के लिए भेजकर, आने पर पूछूँगा—
आज तूने क्या देखा ? क्या किया ? तब यह मुझे बताएगा कि आज यह देखा,
यह किया । तब मैं इसे पूछूँगा कि जो तूने आज देखा किया, वह कैसा है ?
वह 'ऐसा है' मुझे उपमा देकर, बातों से समझाएगा । इस प्रकार इससे नई नई
उपमाएं और बातें कहलवाकर मैं इसे इस उपाय से पण्डित बना दूंगा ।
तब उन्होंने उसे बुलवाकर कहा—तात ! माणवक ! अब से तू जहाँ
लकड़ी लेने या पत्ते लेने जाए वहाँ जो देखे, जो सुने, जो खाए, पीए, वह
आकर मुझे कहा कर । उसने 'अच्छा' कह स्वीकार किया ।
एक दिन वह विद्यार्थियों के साथ लकड़ी लाने जंगल गया । वहाँ उसने
एक साँप देखा । आकर आचार्य्य से कहा—आचार्य्य, मैंने साँप देखा ।
"तात ! साँप कैसा होता है ?"
"हल की फाल की तरह ।"
'तात ! बहुत अच्छा । तूने सुन्दर उपमा दी । साँप हल की फाल
की ही तरह होते हैं।"
बोधिसत्व ने सोचा—विद्यार्थी को अच्छी उपमा सूझी है । मैं इसे पण्डित
बना सकूँगा ।
विद्यार्थी ने फिर एक दिन जंगल में हाथी देख आकर कहा—आचार्य्य,
मैंने हाथी देखा ।
"तात ! हाथी कैसा होता है ?"
"हल की फाल की तरह ।"
बोधिसत्त्व सोचने लगे—हाथी की सुण्ड तो हल की फाल की तरह होती
है, लेकिन उसके दाँत आदि तो ऐसे ऐसे होते हैं । मालूम होता है यह अपनी
मूर्खता के कारण पृथक पृथक करके वर्णन नहीं कर सकता । वे चुप रहे ।
एक दिन निमन्त्रण में खीर पाकर कहा—