जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context५० [ १.१३.१२२
हथवान् ने सोचा सारे जम्बूद्वीप मे इसे हाथी के समान सुशिक्षित हाथी
नही है। निस्सशय यह राजा इसे प्रपात में गिरवाकर मरवाना चाहता है।
उसने हाथी के कान में कहा—"तात ! यह राजा तुझे प्रपात में गिराकर मार
डालना चाहता है। तू इसके योग्य नही है। यदि तुझमें आकाश-मार्ग से जाने
का बल हैं, तो जैसे में बैठा हूँ वैसे ही मुझे ले आकाश मे उड वाराणसी चल।"
पुण्य-ऋद्धि से युक्त वह हाथी उसी समय आकाश में सडा हो गया।
हथवान् ने कहा—'महाराज ! यह हाथी पुण्य-ऋद्धि से युक्त है। यह तेरे
जैसे पुण्य-रहित दुर्बुद्धि के योग्य नही है। यह (किसी) पुण्यवान् पण्डित
राजा के योग्य है। तेरे सदृश अपुण्यवान् इस प्रकार का वाहन पा उसके गुणो
को न पहचान उस वाहन को तथा सारी सम्पत्ति को नष्ट ही कर डालते है।'
इतना कह हाथी के कन्धे पर बैठे ही बैठे यह गाथा कही—
यस लद्धान दुम्मेधो अनत्थं चरति अत्तनो,
अत्तनो च परेसं च हिंसाय पटिपज्जति ॥
[ मूर्ख आदमी सम्पत्ति को प्राप्त हो अपनी हानि करता है। वह अपनी
और दूसरो की हिंसा करता है।]
यह सक्षिप्तार्थ है—महाराज ! उस प्रकार का दुम्मेधो, प्रज्ञाहीन आदमी
परिवार-सम्पत्ति पाकर अत्तनो अनत्थं चरति । क्यो ? वह सम्पत्ति के मद में
बेहोश हो, कुछ न जानने के कारण अत्तनो च परेसं च हिंसाय पटिपज्जति,
हिंसा का अर्थ है क्लेश, दुख देना, वही करता है।
इस प्रकार इस गाथा से राजा को धर्मोपदेश दे 'अब तू यहाँ रह' वह आकाश
में उडकर वाराणसी जाकर राजा के आँगन में आकाश मे रहा। सारे नगर
में एक हल्ला हो गया—हमारे राजा के पास आकाश से एक श्वेत-श्रेष्ठ हाथी
आकर राजा के आँगन पर ठहरा है। जल्दी से राजा को भी खबर दी गई।
राजा ने निकलकर कहा—यदि मेरे उपयोग के लिए आया है, तो जमीन पर
उतर । बोधिसत्त्व जमीन पर उतरे। हथवान् ने उतरकर राजा को प्रणाम
किया। राजा ने पूछा—"तात ! कहाँ से आया है ?" "राजगृह से" कह
सब समाचार सुनाया ।