जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 66 of 479
Read in contextकुसनाळि ] ४५
सभी अपने सिर पर आ पडे भार का वहन करते हैं। अब तो तू अपने स्थिर-
मित्र के कारण धन का स्वामी हुआ। पुराने समय में पक्के-दोस्त के कारण
विमान के स्वामी हुए।"
इतना कह, पूछने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व राजा
के उद्यान में एक कुशा-घास के झुंड में के देवता हुए। उसी बाग में मगल-शिला
के सहारे सीधे तनेवाला और चारो तरफ शाखाओ तथा पत्तो से घिरा हुआ,
राजा द्वारा आदृत राजा का प्रिय-वृक्ष १ था। उसे मुक्खक भी कहते थे।
उसमे एक वडा प्रतापी देवराज पैदा हुआ। बोधिसत्त्व से उसकी दोस्ती हो गई।
उस समय राजा एक खम्भे वाले प्रासाद में रहता था। खम्भा फटने लगा।
राजा को इसकी सूचना दी गई। राजा ने बढइयो को बुलवाकर कहा "तात !
मेरे एक खम्भे वाले मगल प्रासाद का खम्भा जा रहा है। एक सारवान् खम्भा
ला कर उस खम्भे को स्थिर करे।" उन्होने 'देव ! अच्छा' कह राजा के
वचन को स्वीकार कर उसके अनुरूप वृक्ष ढूँढना आरम्भ किया। वृक्ष न पा,
राजा के उद्यान में जा उस मुक्खक वृक्ष को देख राजा के पास गए। राजा
ने पूछा—
"तात ! क्यो उसके अनुरूप वृक्ष देखा ?"
'देव ! देखा, लेकिन उसे काट नही सकते ?
"क्यो ?"
"और कही वृक्ष न दिखाई देने पर हम उद्यान में गए। वहाँ मगल-वृक्ष
को छोड और कोई वृक्ष नही दिखाई दिया। उसे मगल-वृक्ष होने के कारण
नही काट सकते।"
"जाओ, उसे काट कर प्रासाद को मजबूत करो। हम दूसरा मगल-
वृक्ष कर लेगे।"
१ 'रुचरुक्खो' कुछ अस्पष्ट है।