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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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पहला परिच्छेद
१३. कुसनाळि वर्ग
१२१. कुसनाळि जातक
“करे सरिक्खो” यह धर्मोपदेश शास्ता ने जेतवन मे रहते समय अनाथ
पिण्डिक के स्थिर-मित्र के बारे में दिया।
क. वर्तमान कथा
अनाथ पिण्डिक के मित्र, सुहृद, रिश्तेदार और बन्धु इकट्ठे होकर उसे
बार बार मना करते थे—“महासेठ ! यह न जाति मे, न गोत्र में, न धन-
धान्य में ही तेरे समान है, और न तुझ से बढकर ही है। तू इसके साथ क्यो
मित्रता करता है ? इसके साथ मित्रता मत कर ?” अनाथ पिण्डिक का ख्याल
था कि दोस्ती अपने से छोटे से, बराबरवाले से और श्रेष्ठतर से—सभी से
करनी चाहिए, इसलिए उसने उनका कहना नही माना। अपनी जमींदारी
के गाँव¹ पर जाते समय वह उसे अपनी सम्पत्ति की देखभाल करने के लिए
नियुक्त कर गया। आगे की कथा कालकण्णिकथा² के अनुसार ही समझनी
चाहिए। लेकिन इस कथा मे अनाथ पिण्डिक के अपने घर का समाचार
कहने पर शास्ता ने कहा—“हे गृहपति ! मित्र कभी तुच्छ नही होता।
मित्र-धर्म की रक्षा कर सकने का सामर्थ्य ही असल में होना चाहिए। मित्रता
अपने से छोटे से भी करनी चाहिए, बराबरवाले से भी और श्रेष्ठ से भी।
¹ भोग गाँव; जिस गांव से गांव का स्वामी पैदावार के रूप में अथवा
अन्य किसी रूप में वसूली करता था।
² कालकण्णि जातक (८३)