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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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३८ [ १.१२.११६
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उदीच्य ब्राह्मण-कुल में जन्म ग्रहण कर सयाने होने पर, सब शिल्पो में पारङ्गत
हो, चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य बन पांच सौ शिष्यो को शिल्प बेंचवाते
(सिखाते) थे। उन शिष्यो के पास समय पर बोलनेवाला एक मुर्गा था।
वे उसके बांग देने पर उठकर शिल्प सीखते थे। वह मर गया। तब वह
कोई दूसरा मुर्गा ढूंढ़ते फिरते थे। एक शिष्य ने श्मशान वन में लकड़ी इकट्ठी
करते समय एक मुर्गे को देख, उसे लाकर पिंजरे में बन्द कर, पाला। वह श्मशान
में बडा हुआ होने से यह न जानता था कि किस समय बोलना चाहिए। कभी
आधी रात को बोलता कभी अरुण उदय होने पर। शिष्य उसके बहुत रात
रहते बोलने पर उसी समय शिल्प सीखना आरम्भ करने के कारण अरुणोदय
तक न सीख सकते थे। नींद के मारे सीखा हुआ भी भूल जाते। बहुत प्रभात
होने पर बोलने के समय पाठ करने का अवकाश ही न रहता।
शिष्यो ने सोचा, यह या तो बहुत रात रहने पर बोलता है, या बहुत दिन
चढ़ने पर। इस (की मदद) से हमारा शिल्प (सीखना) समाप्त न होगा।
यह सोच उसकी गर्दन मरोड उसे मार डाला। फिर आचार्य के पास जाकर
कहा कि हमने असमय शोर मचानेवाले मुर्गे को मार डाला।
आचार्य ने कहा कि वह प्रशिक्षित ही वृद्धि को प्राप्त हुआ था। इसी से
मरा। इतना कह यह गाथा कही—
अमातापितरि संवड्ढो अनाचरियकुले वस,
नायं काल अकाल वा अभिजानाति कुक्कुटो ॥
[ न माता-पिता से शिक्षा ग्रहण करते हुए बडा, न आचार्य्य-कुल मे ही
रहा। यह मुर्गा न समय जानता था, न असमय।]
अमातापितरि संवड्ढो, माता पिता के पास उनका उपदेश न ग्रहण करता
हुआ बढा। अनाचरिय कुले यस, आचार्य कुल मे भी न रह कर आचार-शिक्षा
न ग्रहण करने के कारण असंयमी। पायं अकाल वा इस समय बोलना चाहिए,