जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context२ [ १.११.१०२
१०२. पण्णिक जातक
“यो दुक्खफुट्ठाय भयेय्य ताण .” आदि (की कथा) शास्ता ने जेत-
वन में रहते समय एक दुकानदार उपासक के सम्बन्ध में कही।
क. वर्तमान कथा
वह श्रावस्ती निवासी उपासक नाना प्रकार की जड़ी-बूटी तथा लौकी-
कद्दू आदि बेच कर गुजारा करता था। उसकी एक लडकी थी। रूपवान,
सुन्दर, सदाचारिणी तथा लज्जा-भय से युक्त, (लेकिन साथ ही) सदा हँसती
रहती थी। बराबरी के कुलवालो ने लडकी को ब्याहने आने (की इच्छा करने )
पर, वह सोचने लगा— “इसकी शादी होगी। यह सदैव हँसती रहती है।
क्वारपन को नष्ट करके यदि कुमारी दूसरे कुल में जाती है, तो माता पिता के
लिये निन्दा का कारण होती है। मैं इसकी परीक्षा करूँगा कि इसका क्वारपन
स्वरक्षित है कि नहीं ?”
एक दिन उसने लडकी से टोकरी उठवा, पत्तो के लिये जगल में जाकर,
उसकी परीक्षा करने की इच्छा से, कामासक्त की भाँति हो, गुप्त बात कह उस
हाथ से धर लिया। जैसे ही उसे पकडा उसने रोते चिल्लाते हुए कहा—
“तात ! यह नामुनासिब है, यह पानी से आग निकलने के सदृश है।
ऐसा न करें।”
“धम्म ! मैने केवल परीक्षा करने के लिए ही तुझे हाथ से धरा था।
अब, बता कि तेरा क्वारपन (सुरक्षित) है या नहीं ?”
“हाँ तात ! है। मैने राग के वशीभूत हो किसी भी पुरुष की ओर नही
देखा।”
उसने लडकी को आश्वासन दे घर ले जा, विवाह करके पराये कुल भेजा।
(फिर) शास्ता की वन्दना करने की इच्छा से, गन्ध-माला आदि हाथ में ले,