जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context१६० [ २.२.१६३
मृगी को सिंह, व्याघ्र और चीते का मुंह चाटते देखा, तो 'सत्पुरुष से मित्रता
करने से बढ़कर सुख नहीं है' सोच दूसरी गाथा कही—
न सन्थवस्मा परमत्थि सेय्यो
यो सन्धवो सप्पुरिसेन होति
सीहस्स ब्यग्घस्स च दीपिनो च
सामा मुखं लेहति सन्धयेन ॥
[ सत्पुरुष से जो स्नेह होता है, उस स्नेह से बढ़कर श्रेष्ठ कुछ नहीं है।
श्यामा मृगी स्नेह से सिंह, व्याघ्र और चीते का मुंह चाटती है। ]
सामा मुखं लेहति सन्धयेन, श्यामा मृगी इन तीनों जनो का मैत्री से,
स्नेह से मुंह चाटती है।
इस प्रकार वह बोधिसत्व हिमालय में चले गए। वहाँ ऋषियों की प्रव्रज्या
ग्रहण कर अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर, मरने पर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय तपस्वी में ही था।
१६३. सुसीम जातक
“काळामिगा सेतदन्ता तव इमे···” यह शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय छन्दकदान¹ के बारे में कही।
¹ वह दान जिसके देने में छन्द (vote) दिया गया हो।