जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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. उसे घर रहने की इच्छा नही थी। इसलिए वह जंगल में जा अग्नि की
पूजा कर ब्रह्मलोक गामी होने की इच्छा से जन्म-दिन से रक्खी हुई आग ले,
माता पिता को प्रणाम कर जगल चला गया। वहाँ पर्ण-कुटी में रहता हुआ
अग्नि की पूजा करने लगा।
एक दिन वह किसी निमन्त्रित स्थान पर गया। वहाँ उसे घी के साथ
खीर मिली। उसने सोचा इस खीर से महा-ब्रह्मा का यज्ञ करूँगा। उसने
खीर ला आग जलाई। फिर सोचा घी मिश्रित खीर भगवान् अग्नि को पिलाऊँ
और खीर को आग मे फेंका। बहुत चिकनाई वाली खीर के आग में पड़ते ही
आग जोर से जली और उसकी जोर से उठी लपट ने पर्ण-कुटी जला डाली।
ब्राह्मण डरकर, घबरा कर भाग गया। बाहर खड़े होकर उसने सोचा
कि बुरे से दोस्ती नहीं करनी चाहिए। अब इसने बड़ी कठिनाई से बनाई मेरी
कुटिया जला डाली। इतना कह यह गाथा कही—
. न सन्थवस्मा परमत्थि पापियो
यो सन्थवो कापुरिसेन होति,
सन्तप्पतो सप्पिना पायसेन
किच्छा कतं पण्णकुर्टि अदड्ढहि ॥
[बुरे आदमी की मैत्री से बढ़कर बुरा कुछ नही। आग को घी वाली
खीर से सन्तर्पित किया। उसने कठिनाई से बनी पर्ण-कुटी जला दी।]
न सन्थवस्मा, आसक्ति और मैत्री, यह जो दोनो प्रकार की दोस्ती है,
इससे बढ़कर दूसरी बुरी बात नहीं है। यो सन्थवो कापुरिसेन, जो पापी
बुरे आदमी के साथ दोनो तरह की दोस्ती है, इस दोस्ती से बढ़कर और बुरा
कुछ नही। किस लिए ? सन्तप्पतो....अदड्ढहि, क्योकि घी और घी से
सन्तर्पित की गई इस आग ने भी बडी कठिनाई से बनाई हुई मेरी पर्ण-कुटी
जला दी।
इतना कह, 'उस मित्र-द्रोही से मुझे कुछ मतलब नही' सोच उसे पानी से
बुझा, शाखाओ से पीट हिमालय में चला गया। वहाँ उसने जब एक श्यामा