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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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८० [ १.१४.१३२
उसे भी सुनकर वह चुप ही रहा।
राजा ने मन्त्रियों के साथ सलाह करके कि क्या करना चाहिए, सेठ की
निन्दा कर आज्ञा दी—जाओ, पिल्लिय सेठ के घर में जितना धन है, वह सब
सङ्गसेठ को दे दो।
वोधिसत्त्व ने कहा—महाराज ! मुझे पराया धन नहीं चाहिए।
जितना धन मैंने दिया है, उतना ही दिलवा दें।
राजा ने बोधिसत्त्व का धन दिलवा दिया।
बोधिसत्त्व ने अपना दिया हुआ सब धन ले दास-समूह सहित राजगृह जाकर
कुटुम्ब बसाया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करते हुए कर्मानुसार परलोक सिधारे।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिल्लिय
सेठ देवदत्त था। सङ्गसेठ तो मैं ही था।
१३२. पञ्चगरुक जातक
"कुसलोपदेसे पितिया दळहाय च..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन
में विहार करते समय अजपाल न्यग्रोध (वृक्ष) के नीचे मार-कुमारियों द्वारा
प्रलोभित किए जाने के सूत्र के बारे में कही। भगवान् आरम्भ से ही
ऐसे थे—
वड्ढलमाना आगच्छु तण्हा च अरती रगा,
ता तत्थ पनुदी सत्था तूल भट्ठंव मारुतो ॥१
[तण्हा, अरति और रगा (मारकन्याएँ) प्रभास फैलाती हुई आईं।
शास्ता ने उनको ऐसे दूर भगा दिया जैसे हवा उड़ती हुई रूई को।]
१ सयुत्त-निकाय, मार-सयुत्त ।