जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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मतलब टूट जाते हैं। तस्मा हरामि भुसं अटुठमानं, इसी कारण रो प्रकट करता
हूँ कि मैं मित्र का दिया हुआ तूम्बा भर भुस ले आया हूँ। आठ नाळि को
मान कहते हैं। चार नाळियों को अर्ध-मान; और चार ही नाळियो को
तूम्बा; इसी लिए कहा तूम्बा भर भूसा। मा ने मित्ति जीयित्य सस्मताय,
मेरे मित्र से मेरा मैत्री भाव न टूटे। हमेशा बना रहे।
ऐसा कहने पर भी सेठानी रोती ही रही। उसी समय सङ्घसेठ द्वारा
पीळिय सेठ को दिया गया एक दास शाला के दरवाजे के पास से गुजर रहा
था। उसने सेठानी के रोने की आवाज सुनी। अन्दर जाकर जब उसने देखा
कि उसके स्वामी है तो पैरो पर गिर पडा और रोने-चिल्लाने लगा। उसने
पूछा- "स्वामी ! यहाँ कैसे आए ?" सेठ ने सब हाल कह दिया। दास बोला
-स्वामी, हो, चिन्ता न करें। इस प्रकार दोनों को दिलासा दे अपने घर ले
गया। वहाँ सुगन्धित जल से नहलाया, खिलाया। फिर अन्य सब दासों को
खबर कर दी कि स्वामी आए हैं। कुछ दिन बिताकर सभी दासो की राय से
वह राजा के यहाँ पहुँचा और शोर किया।
राजा ने बुलवाकर पूछा- यह क्या है ?
उन्होंने यह सब हाल राजा को कह दिया। राजा ने उनकी बात सुन
दोनो सेठो को बुलवा सङ्घसेठ को पूछा-
"महासेठ ! क्या तूने सचमुच पिळिय सेठ को चालीस करोड धन दिया ?"
"महाराज ! मेरी आशा लगा जब मेरा मित्र मेरे पास राजगृह आया
तो मैंने उसे न केवल चालीस करोड धन ही दिया बल्कि जितना भी मेरे पास
धन था, चाहे जानदार चाहे बेजान सभी के दो बराबर हिस्से कर एक हिस्सा
दिया।"
राजा ने पिळिय सेठ से पूछा- क्या यह सच है ?
"देव ! हाँ ठीक है।"
"तेरी ही आशा लगाकर तेरे पास आनेपर तूने भी इसका कोई सत्कार
सम्मान किया ?"
वह चुप रहा।
"तूने तूम्बा भर भूसा इसके पल्ले में ढलवाकर दिया है ?"