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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

by श्री गुरु नानक देव जी

DevanagariHindipublished56 pages

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM

सरम खंड की बाणी रूप ॥
तिथै घाड़त घड़ीऐ बहुत अनूप ॥
ता कीआ गला कथीआ ना जाहे ॥
जे को कहै पिछै पछुताए ॥
तिथै घड़ीऐ सुरत मत मन बुध ॥
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुध ॥३६॥

ज्ञान खण्ड में जो ज्ञान कथन किया है वह प्रबल है। इस खण्ड में
रागमयी, प्रसन्नतापूर्ण व कौतुकी आनंद विद्यमान है।(श्रम खंड में
परमेश्वर की भक्ति को प्रमुख माना गया है) परमेश्वर की भक्ति
करने का उद्यम करने वाले संतजनों की वाणी मधुर है। वहाँ (श्रम
खण्ड में) पर अद्वितीय सुन्दरता वाले स्वरूप की गढ़न की जाती
है। उनकी बातों का कथन नहीं किया जा सकता। यदि कोई उनकी
महिमा कथन करने की चेष्टा करता भी है तो उसे बाद में पछताना
पड़ता है। वहाँ पर वेद-श्रुति, ज्ञान, मन और बुद्धि गढ़े जाते हैं।
वहाँ पर दिव्य बुद्धि वाले देवों व सिद्ध अवस्था की प्राप्ति वाली
सूझ गढ़ी जाती है॥ ३६॥

करम खंड की बाणी जोर ॥
तिथै होर न कोई होर ॥

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