इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextसे ही नित्य यज्ञ करने की प्रथा डाली थी और यज्ञ की हवि में चीनी, मीठा मिलाया ही जाता है।
न वै स्वयं तदशीयादितिथि यन्न भोजयेत्।
धन्य यशस्यमायुष्य स्वार्थं वाजितिथिपूजनम्॥
मनु ३/१०६
अर्थ- जो अतिथि को भेजनार्थ न दे उसमें से आप भोजन न करें, यह अतिथि पूजन धन्य है, धन हितार्थ, यश, आयु तथा स्वर्ग का देने वाला है।
अब आप समझ गये होंगे कि यह पीछों यज्ञ मनुष्य जीवन में कितने उपयोगी हैं। नित्य नियमित रूप से करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की लिखित पंच महायज्ञ विधि में देखें।
प्राणायाम
मनुष्य शरीर में सबसे अधिक महत्व का अंग है तो वह फेफड़े हैं। फेफड़े हर समय श्वास की गति के साथ दृषित रक्त को लेकर उसे शुद्ध करके बाहर धमनियों में भेज देते हैं। जब मशीन से कार्य नहीं लिया जाता है तो उसे जंग लग जाती है। और अन्त में वह मशीन बेकार होकर समाप्त हो जाती है। यही स्थिति हमारे फेफड़ों की है। हम जो श्वास हर समय लेते हैं वह इतनी गति का नहीं होता कि वह फेफड़े के सबसे निचले भाग में वायु पहुँचा सके। सबसे निचले भाग में वायु पहुँचाने के लिए और उसे बेकार होने से बचाने के लिए पूर्वजों ने प्राणायाम को रखा है। फेफड़े के सबसे निचले भाग में जब वायु नहीं पहुँचेगी तो फेफड़े के उस भाग के छिद्रों में रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा, और जब रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा तो वह भाग कर्महीन होता हुआ उसी प्रकार बेकार हो जायेगा जिस प्रकार
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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