Skip to content
SarvaKosh
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

Page 54 of 250

Read in context
Page 54

आदि द्वारा अन्नादि और अन्नादि द्वारा मनुष्यों के शरीर, बल, बुद्धि, पराक्रमादि गुण और सभी कार्य निकृष्ट हो जाते हैं। जबकि वायु को दुर्गन्ध और निकृष्ट करने वाले मनुष्य ही हैं तो उसका निवारण भी मनुष्यों को ही करना उचित है। वह निवारण यज्ञ द्वारा ही हो सकता है। मनुष्य अपने कृत्यों द्वारा जितनी दुर्गन्ध उत्पन्न करता है। तो उसे उचित है कि उस दुर्गन्ध से अधिक न हो तो कम से कम दुर्गन्ध के बराबर ही सुगन्ध को भी यज्ञ द्वारा उत्पन्न करे।

हो सकता है आप कहें कि यज्ञ द्वारा ही सुगन्ध को क्यों उत्पन्न किया जाय। हम उसे पुष्प, तेल, इत्र, आदि का उपयोग करके उत्पन्न कर सकते हैं। परन्तु मेरे मित्र! इत्र आदि की सुगन्ध आप तक ही सीमित रहती है, और अग्नि उसके तत्वों को विकसित करके, वायु उसे दूर तक प्रसारित कर देती है। जिस प्रकार एक लाल मिर्च खाने से उसी खाने वाले को चरपरी लगती है और उसी को कष्ट देती है। यदि वही लाल मिर्च अग्नि के अर्पण कर दी जाय तो एक ही मिर्च अग्नि और वायु के सहयोग से दूर तक मनुष्यों को व्याकुल कर देती है, और अधिक समय तक मनुष्य खाँसते, छींकते रहते हैं। इसलिए उस इत्र पुष्पादि सुगन्धित पदार्थ को अपने पास न रखकर उसे अग्नि के अर्पण करके सबका उपकार करना उचित है।

हमारे पूर्वज दैनिक यज्ञ से लेकर अश्वमेध यज्ञ तक किया करते थे। उस समय वायु उत्तम होकर जल वृष्टि अन्नादि भी उत्तम होते थे और उस उत्तम अन्न जल का पान करके मनुष्यों का शरीर, बल, वीर्य, बुद्धि, पराक्रम, धैर्य, शूरवीरतादि गुण उत्तम होकर समस्त विश्व को ज्ञान देकर चक्रवर्ती राज्य द्वारा सुखोपम व्योत्था का संचालन करते थे।

जो यज्ञ करता है वह अपना और अपने देश का भला करता है।

इच्छानुसार सन्तान

५०

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri