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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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अर्थ- यह पाँच वस्तु गृहस्थ में हिंसा का मूल हैं। चूर्त्ता, चक्की, बूहारी, उलूखल, मूसल, जल का घड़ा इनको अपने कर्मों में लाता हुआ (पाप से) बँध जाता है।

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्य महर्षिः।

पञ्च कल्पता महायज्ञः प्रत्यहं गृसमेधिनाम्॥

मनु ३/१९

अर्थ- गृहस्थियों को उन पापों के प्रायश्चित्तार्थ महर्षियों ने प्रतिदिन के पंच महायज्ञ रचे हैं।

अध्यापन ब्रह्मयज्ञः पितु यज्ञस्तु तर्पणम्।

होमो दैवोबलि भौतोनयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥

मनु ३/७०

अर्थ- ब्रह्मयज्ञ=वेद पाठ स्वाध्याय करना। पितु यज्ञ= तर्पण माता-पिता गुरु आदि को भोजन वस्त्र से तृप्त करना। देवयज्ञ=होम अग्नि होत्र करना। बलिवैश्य यज्ञ=बनाये हुए भोजन में से जो लवण रहित हो उसकी दस आहुति अग्नि में दें। अतिथि यज्ञ=विद्वानों का सत्कार करना।

अधं स केवलं मुङ्क्तयः पञ्चत्यात्मकारणात्।

यज्ञं शिष्टाशनं द्वीतस्ततामन्नं विधीयते॥

मनु ३/१२८

अर्थ- जो केवल अपने लिए अन्न पकाता है वह निरापाप खाता है, और जो यज्ञादि से शेष अर्थात् बलिवैश्य यज्ञ के पश्चात् का भोजन है वह सज्जनों का भोजन है।

यज्ञशिष्टाशनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बषैः।

भुज्यंते ते स्वर्घं पाप ये पञ्चत्यात्मकारणात्॥

गीता ३/१३

अर्थ- कारण! कि यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूटते हैं और जो पापी लोग अपने शरीर पोषण के लिए ही (अन्न) पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri