इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextतासामाद्याश्चतस्वस्तु निन्दितैकादशी च या।
त्रयोदशी च शेषस्तु प्रशस्ता दश रात्रयः॥
मनु ३/४७
अर्थ- उनमें चार प्रथम की और ११वीं और १३वीं ये छः (रात्रि स्त्री भोग में) निषिद्ध हैं और शेष दस रात्रि श्रेष्ठ हैं।
'जिनको पुत्र की इच्छा हो वे छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, चौदहवीं और सोहलहवीं ये छः रात्रि ऋतुदान में उत्तम जानें, परन्तु इनमें भी उत्तर-उत्तर श्रेष्ठ हैं।'
संस्कार विधि गर्भाधान प्रकारण
इसमें स्वामी जी ने अन्त की दो रात्रियाँ ऋतुदान के लिए ही उत्तम कही हैं जैसे १५ और १६। कन्या के लिए १५ और पुत्र के लिए १६ उत्तम हैं।
अमावास्याष्ठमी च पौर्णमासी चतुर्दशीम्।
ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्युत्तोस्नातको द्विजः॥
मनु ४/१२८
अर्थ- अमावास्या, अष्टमी, पौर्णमासी और चतुर्दशी इन तिथियों में पूर्वोक्त स्नातक द्विज और ऋतुकाल में भी भायां के पास न जावे।
तथा ग्रहण समय, संक्रान्ति, दिन, सन्ध्या समय, माता, पिता की मृत्यु तिथि भी वर्जित हैं। स्त्री रक्त वर्ण के वस्त्र पहने हुई, सोते समय परदेश में और दूसरे के गृह पर गर्भाधान नहीं करना चाहिए। इससे सन्तान अल्पानु और दुर्गावती होती है।
पर्वस्वभिगमोऽधन्यो दिवा पापप्रदो नृप।
भुवि रोगवहो नृणामप्रशस्तो जलाशयः॥
विष्णु पुराण ३/१२/१२२
अर्थ- पर्व दिनों में स्त्री गमन करने से धन की हानि होती है, दिन में पाप होता है, पृथ्वी पर रोग तथा जलाशय में स्त्री प्रसंग करने से नपुंसकता और अमंगल होता है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri