हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
by महाकवि बाणभट्ट
About this granth
Banabhatta's Harshacharita is a high point of Sanskrit prose, with long compounds, double meanings and richly pictorial description, so students usually read it with a commentary. It is also a contemporary source for the Pushyabhuti dynasty of Thanesar and the early life of King Harsha.
This scan is a separate copy of the Chowkhamba Vidya Bhawan edition (Vidyabhawan Sanskrit Granthamala No. 36) with Shankara's Sanketa commentary and the Hindi commentary of Pt. Jagannath Pathak, Sahityacharya. It is from the fourth edition of 1982, which was also sold in parts: chapters 1 to 2, chapters 1 to 4, and the complete text.
The 184 pages here hold the opening chapters. The sections marked in this reader cover the Vatsyayana lineage, Bana's own story and his visit to Harsha's court, the land of Shrikantha and the life of Prabhakaravardhana, the births of Rajyavardhana and Harsha, and events around the campaign against the Hunas. The copy belongs to the Panini Kanya Mahavidyalaya collection, digitised by the Arya Samaj Foundation, Chennai, and eGangotri, and suits students whose syllabus prescribes the early ucchvasas.
१३८ हर्षचरितम्
शुचिशयचरणेषु चैत्यप्रणतिपरेषु पाराशरिषु, यज्ञपात्रपवित्रपाणौ प्रकीर्ण-
बर्हिष्युत्तेजसि जातवेदसि हवींषि वषट्कुर्वन्ति यायजूकजने, निद्राविद्राण-
द्रोणणकुलकलिलकुलायेषु कापेयविकलकपिकुलेष्वारामतरुषु निर्जिगमि-
षति जरत्तरुकोटरकुटीकुटुम्बिनि कौशिककुले, मुनिकरसहस्रप्रकीर्णसन्ध्या-
वन्दनोदबिन्दुतिकर इव दन्तुरयति तारापथस्थलीं स्थवीयसि तारकानि-
कुरुम्बे अम्बराश्रयिणि शर्वरीशबरीशिखण्डे खण्डपरशुकण्ठकाले कव-
लयति बाले ज्योतिः शेषं सान्ध्यमन्धकारावतारे, तिमिरतर्जननिर्गतासु
दहनप्रविष्टदिनकरकरशाखास्विव स्फुरन्तीषु दीपलेखासु, अररसम्पुटसंकी-
ऽडनकथितावृत्तिष्विव गोपुरेषु, शयनोपजोषजुषि जरतीकथितकथे शिश-
यिषमाणे शिशुजने, जरन्महिषमषीमलीमसतमसि जनितपुण्यजन प्रजा-
न्धयस्तर्णकश्च वत्सः । धुनी नदी । सिन्धुः समुद्रः । शयः करः । चैत्यमायतनम् ।
पाराशरिषु भिक्षुषु । हवींषि कुशाः । वषडिति दानक्रियासु मोचनमन्त्रः वषट्
कुर्वन्ति । जुह्वतीत्यर्थः । यायजूकोऽत्यर्थं यजनशीलः । निद्राणोऽलसः । द्रोणः
काकः । कलिला आकुलाः । 'कुलायो नीडमस्त्रियाम्' । कापेयं चापलम् । कौशिका
उलूकाः । स्थवीयसि स्थूलतरे । शिखण्डो जूटकः । खण्डपरशुः शिवः । करा एव
शाखास्तदाकारत्वादंगुलयश्च करशाखाः । अररः कपाटः । संक्रीडनं शब्दः ।
आवृत्तिः स्थगनम् । 'गोपुरं स्यात्पुरद्वारं द्वारमात्रेऽपि गोपुरम्' । उपजोषः सुखम्,
तूष्णींभावो वा । जरती वृद्धाः । शिशयिषमाणे सुषुप्सति । 'यक्षाः स्युः पुण्य-
होकर सूर्यसंध्या के समुद्ररूपी मधपात्र में डूबने लगा । भिक्षु लोग कमण्डलु के जल से
अपने हाथ-पैर पवित्र धोकर चैत्यों की वन्दना करने लगे । स्रुक् स्रुवा आदि यज्ञपात्रों को हाथ
में लेकर यज्ञ करने वाले लोग कुश को बिछा कर प्रज्ज्वलित अग्नि में वषट्कार के द्वारा हविष
छोड़ने लगे । उपवन के वृक्षों पर नींद से अलसाए कौवे खोतों में काँव-काँव करने लगे और
बन्दर अपनी चपलता छोड़ बैठे । पुराने खंखड़ वृक्षों में बैठे हुए उल्लू अब निकलना ही चाहते
थे । झुग्गे के झुग्गे बड़े तारे आकाश की स्थली में छिटकने लगे, मानो सन्ध्यावन्दन के अवसर
पर मुनियों द्वारा छींटे गए जल के बिन्दु हों। अब अन्धकार आकाश में उतरने लगा, मानों
रात्रिरूपी भीलनी के केशपाश का जूड़ा हो, वह भगवान् शंकर के कण्ठ के समान श्याम
था और सन्ध्या के बचे हुए तेज को निगलता जा रहा था। दीपलेखाएँ इस प्रकार
स्फुरित होने लगीं मानों अग्नि में प्रविष्ट सूर्य की किरणरूपी अङ्गुलियाँ हों, जो अन्धकार
के तर्जनार्थ निकल पड़ी थीं । गोपुर के दरवाजों के बन्द होने की गड़गड़ाहट
अब शान्त हो गई। बच्चे खाट पर चुपचाप पड़े बूढ़ी दादी की कहानी
गरे विजृम्भमाणे भीषणतमे तमीमुखे, मुखरितविततसप्तभुक्तिकालवर्षति
शरनिकरमनवरतमशेषसंसारशेमुषीमुषि मकरध्वजे, रताकल्पारम्भशो-
भिनि शम्भलीसुभाषितभाजि भजति भूषां भुजिष्याजाने, सैरन्ध्रीबध्य-
मानरशनाजालजल्पाकजघनासु जनीषु, वशिकविशिखाविहारिणीष्वन-
न्यजानुप्लवासु प्रचलितास्वभिसारिकासु, विरलोभवति वरटानां वेशन्त-
शायिनीनां मञ्जुनि मञ्जीरशिञ्जितजडे जल्पिते, निद्राविद्राणद्रा-
घीयसि द्रावयतीव च विरहिहृदयानि सारसरसिते, भाविवासरबीजाङ्कुर-
निकर इव च विकीर्यमाणे जगति प्रदीपप्रकरे निवासस्थानमगात्।
अकरोच्च चेतसि—'अतिदक्षिणः खलु देवो हर्षः, यदेवमनेकबालचरित-
जनाः'। तमी रात्रिः। शेमुषी बुद्धिः। आकल्पो वेशः। शम्मली कुट्टनी। भुजिष्या
दासी। सैरन्ध्री प्रसाधनोपचारज्ञा। जनी। वशिका शून्या। विशिखा रथ्या।
अनन्यजः कामः। अनुप्लसवः सहायः। 'कान्तार्थिनी तु या याति संकेतं साभि-
सारिका'। 'हंसस्य योषित्त्वरटा'। वेशन्तः पल्वलम्। कासारोऽत्यल्पसरः। मञ्जीरं
सुनते-सुनते ऊँघने लगे। बूढ़ी भैंस एवं स्याही की भाँति मलिन अन्धकार से युक्त रात्रि
का अत्यन्त भयानक मुख (आरम्भ) जँभाई लेने लगा (बढ़ने लगा) और उसने पुण्यजनों
(यक्षों) को जगा दिया। समस्त संसार की बुद्धि का अपहरण करने वाला कामदेव अपना
धनुष चढ़ा कर टंकार भरने लगा और निरन्तर बाणों की वर्षा करने लगा। लौड़ियां
सुरत काल की वेषरचना के आरम्भ से शोभित होने लगी एवं कुट्टनियों के उपदेश पाकर
अलङ्कार धारण करने लगीं। वधुओं के जघन-भाग प्रसाधिकाओं द्वारा करधनी के बाँधे
जाने पर मुखरित हो उठे। अभिसारिकायें काम की सहायता से सुनसान गलियों में पैंतरा
मारने लगीं। ताल-तलैयों में शयन करने वाली हंसियों की नूपुर के समान मधुर आवाज
कम पड़ने लगीं। निद्रा से अलसाए हुए सारस-पक्षियों की जोरदार आवाज विरहियों
के हृदय को मानो पिघलाने लगीं। चारों ओर दीपक इस प्रकार जलने लगे मानो होने वाले
दिन के बीजांकुर बिखेर दिये गये हों। और (बाण ने) मन में सोचा—"सचमुच देव
हर्ष बड़े ही उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की अनेक चपलताओं से फैले हुए जनापवाद
को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मुझ पर स्नेह ही रखते हैं। यदि मैं उनकी 'आँखों
पर चढ़ा हुआ' (कोपभाजन) होता तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते? वह मुझे गुणी
देखना चाहते हैं। बड़े लोग अनुरूप विश्वास उत्पन्न करके बिना कुछ कहे भी आश्रित-
जनों को विनय का उपदेश दे देते हैं। मुझे धिक्कार है कि अपने ही दोषों से अन्धा,
१४० हर्षचरितम्
'चापलोचितकौलीनकोपितोऽपि मनसा स्निह्यत्येव मयि । यद्यहमक्षिगतः
स्याम्, न मे दर्शनेन प्रसादं कुर्यात् । इच्छति तु मां गुणवन्तम् ।
उपदिशन्ति हि विनयमनुरूपप्रतिपत्त्युपपादनेन वाचा विनापि भर्तव्यानां
स्वामिनः । अपि च धिङ्मां स्वदोषान्धमानसमनादरपीडितमेवमति-
गुणवति राजन्यन्यथा चान्यथा च चिन्तयन्तम् । सर्वथा तथा करोमि,
यथा यथावस्थितं जानाति मामयं कालेन' इत्येवमवधार्य चापरेद्यु-
र्निष्क्रम्य कटकात्सुहृदां बान्धवानां च भवनेषु तावदतिष्ठत, यावदस्य
स्वयमेव गृहीतस्वभावः पृथिवोपतिः प्रसादवानभूत् । अविशच्च पुनरपि
नरपतिभवनम् । स्वल्पैरेव चाहोभिः परमप्रीतेन प्रसादजन्मनो मानस्य
प्रेम्णो विश्रम्भस्य द्रविणस्य नर्मणः प्रभावस्य च परां कोटिमानीयत
नरेन्द्रेणेति ।
इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृते हर्षचरिते राजदर्शनं नाम द्वितीय उच्छ्वासः ।
नूपुरम् । दक्षिणोऽनुकूलः कौलीन जनापवादः । अक्षिगतो द्वेष्यः । विश्रम्भस्याश्वा-
सस्य । द्रविणस्य धनस्य । नर्मणः परिहासस्य ॥
इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते द्वितीय उच्छ्वासः समाप्तः ।
अनादर से दुखी हो ऐसे गुणवान् राजा के विषय में कुछ अनाप-शनाप सोचने लगा । अब
मैं सर्वथा वही करूँगा जिससे समय से वे मुझे ठीक पहचान लें।' ऐसा निश्चय करके दूसरे
दिन प्रातःकाल स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा । तब त-
सम्राट् स्वयं उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गए और फिर बाण ने राज-
भवन में प्रवेश किया । थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने
प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर उसे
पहुँचा दिया ।
द्वितीय उच्छ्वास समाप्त ।
१. चापलोपचित ।
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