हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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अवश्य रखते हैं। मैं उनकी आँखों पर चढ़ा हुआ ( अक्षिगत, अर्थात् कोपभाजन ) होता
तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते । वह मुझे गुणी देखना चाहते हैं। बड़ों की यही रीति
है कि छोटों को बिना मुख से कहे ही केवल व्यवहार से विनय सिखा देते हैं। मुझे
धिक्कार है यदि अपने ही दोषों से अन्धा होकर और केवल अनादर से दुःखी होकर मैं ऐसे
गुणवान् राजा के विषय में कुछ सोचने लगूँ। अब मैं सर्वथा वही करूँगा जिससे समय से
वे ठीक मुझे पहचान लें।' बाण ने ऐसा निश्चय किया और दूसरे दिन प्रातःकाल वह
स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा। तब तक सम्राट् स्वयं
उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गए और फिर वह राजभवन में
आकर जम गया। थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसे अपने
प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर
पहुँचा दिया।
इस प्रकार बाण सम्राट् हर्ष से पर्याप्त सम्मान पाकर किसी समय शरत्काल के आरम्भ
में बन्धुओं को देखने की उत्कण्ठा से अपनी जन्म-भूमि प्रीतिकूट आया। बाण के भाई-
बन्धु उसकी प्रशंसा करते हुए उसके स्वागत में निकल पड़े। सबसे मिलकर बाण बहुत
प्रसन्न हुआ। उसने सबसे पूछा—'आप लोग सुखपूर्वक तो रहे ? यज्ञ का कार्य चल रहा
है ? प्रतिदिन वेदाभ्यास तो अविच्छिन्न है न ? व्याकरण के सम्बन्ध में शास्त्रार्थ तो होते
रहते हैं ? काव्य की चर्चा तो बराबर रहती है ?' तब उन्होंने उससे कहा—'हम लोग
सर्वथा कुशल से हैं। अपनी शक्ति और विभव के अनुसार समय से सब लोग ब्राह्मण के
उचित क्रिया-कलाप करते हैं। जब तुम परमेश्वर महाराज हर्ष के पार्श्वभाग में वेत्रासन
पर स्थित हो तो विशेष रूप से हम लोग प्रसन्न हैं।' इस प्रकार की अनेक बातों से मन
बहलाता हुआ बाण उनके साथ देर तक ठहरा। मध्याह्न में उठ कर वह स्नानादि से निवृत्त
हुआ। भोजन के पश्चात् जब वह बैठा तो सब के सब जुट आए और उसे घेर कर बैठ
गए। इसी बीच सुदृष्टि नामक बाण का पुस्तक-वाचक आ गया और उसके कुछ दूर पर
रखी हुई वेत्रपीठिका पर बैठ गया। क्षणभर ठहर कर तत्काल उसने सूत की बेठन खोल
दी। पुस्तक को उसने सरकंडों के बने पीढ़े पर रख दिया। पीछे समीप में बैठे हुए मधुकर
और पारावत नामक वंशी बजाने वाले बाण के दो मित्रों ने जब अवकाश दिया, तब
सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ करने लगा।
जब सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ कर रहा था, उसी समय सूचीबाण नामक बन्दी ने
दो आर्याछन्दों का गान किया। उसने कहा कि वायु-पुराण हर्ष के चरित से अभिज्ञ प्रतीत
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होता है । आर्याओं को सुन कर बाण के चार चचेरे भाइयों—गणपति, अधिपति, तारापति
और श्यामल ने एक दूसरे की ओर देखा । तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा बाण का
अत्यन्त प्रिय श्यामल बोला—'तात बाण, प्रातःस्मरणीय, पुण्यों के राशि देव हर्ष का चरित
पूर्वपुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हम सुनना चाहते हैं । बहुत दिनों से हम लोगों की
यह इच्छा बनी हुई है । अतः आप कहें । यह भार्गववंश पुण्यवान् राजर्षि के पवित्र
चरित्र को सुनकर और पवित्र बन जाय ।' बाण ने हँस कर अपनी असमर्थता प्रकट करते
हुए दूसरे दिन हर्षचरित का वर्णन आरम्भ करने के लिए निश्चय किया और संध्योपासन
के लिए शोण के तीर पर चले गए ।
इस प्रकार बाण ने दूसरे दिन हर्ष के पूर्व-पुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हर्षचरित
का वर्णन आरम्भ किया । बाण के जीवन के सम्बन्ध में इसके अतिरिक्त कोई वृत्तान्त
उपलब्ध नहीं होता ।
हर्षचरित के अतिरिक्त बाण की दूसरी कृति कादम्बरी है । कादम्बरी संस्कृत गद्य-
साहित्य के चरम-उत्कर्ष का एक उज्ज्वल उदाहरण है । कादम्बरी के आरम्भ में भी
बाण ने संक्षेप में अपनी वंशपरम्परा दी है। कादम्बरी की वंशपरम्परा में कुबेर
के बाद अर्थपति का उल्लेख आता है । बीच में पाशुपत का नाम छूट गया है । हर्ष की
मृत्यु के पश्चात् बाण कन्नौज से प्रीतिकूट लौट आए । वहीं इन्होंने अपने दोनों ग्रन्थों को
लिखा । हर्षचरित से हर्ष के जीवनवृत्त के सम्बन्ध की आकांक्षा की पर्याप्त मात्रा में पूर्ति ,
नहीं होती । बाण जैसे ग्रन्थ को पूरा लिखने में उदासीन हो गए । कादम्बरी को भी वे
अपूर्ण छोड़ गए । सौभाग्य से उनके सुयोग्य पुत्र ने उसे पूरा किया । कुछ लोग उनके पुत्र
का नाम भूषणबाण या भूषणभट्ट बतलाते हैं । कादम्बरी की कुछ हस्तलिखित प्रतियों में
'पुलिन' या पुलिन्द नाम मिलता है । धनपाल की तिलकमञ्जरी में श्लेष से पुलिन्द ही
का उल्लेख है—
केवलोऽपि स्फुरन्बाणः करोति विमदान् कवीन् ।
किं पुनः क्लृप्तसन्धानं पुलिन्दकृतसन्निधिः ॥
( ति. म. २६ श्लोक )
बाण के समकालीन कवियों में मातंगदिवाकर और मयूर का उल्लेख आता है ।
अनुश्रुति के अनुसार मयूर जिन्होंने सूर्यशतक का निर्माण किया है, बाण के श्यालक
बताए जाते हैं । बाण ने अपने विवाह का उल्लेख सम्राट् हर्ष से मिलने के प्रसंग में ही
किया है—'दारपरिग्रहादम्यागारिकोऽस्मि ।' इसके अतिरिक्त उनके वैवाहिक जीवन के
सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक तथ्य प्राप्त नहीं है ।
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बाण की रचनाएँ
बाण की प्रामाणिक रचनाओं में हर्षचरित और कादम्बरी के अतिरिक्त कोई दूसरी
नहीं है। यों तो उनके नाम पर कई अन्य रचनाओं का भी उल्लेख आता है। चण्डीशतक
बाण का निर्मित समझा जाता है। इसमें १०० श्लोकों में बाण ने भगवती दुर्गा की स्तुति की
है। पार्वती-परिणय नाटक को भी कुछ लोगों ने बाण ही का निर्माण समझा था। परन्तु
कीथ ने स्पष्ट कर दिया कि यह नाटक १५ वीं शताब्दी के कवि वामनभट्ट बाण की
रचना है। वामनभट्ट बाण तैलंगदेशीय वत्सगोत्री ब्राह्मण थे। नलचम्पू के टीकाकार
चण्डपाल और गुणविनयगणि के अनुसार बाण ने मुकुटताड़ितक नाटक की भी रचना
की थी, पर यह ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है। जहाँ तक बाण की शैली और
कल्पना का क्षेत्र है उसकी भूमिका में बाण के हर्षचरित और कादम्बरी के अतिरिक्त ये
अन्य कृतियाँ किसी अंश में भी संगत नहीं बैठतीं। अतः प्रामाणिक तथ्य के अभाव
में यह मान लेना ही ठीक है कि इन दोनों के अतिरिक्त बाण की कोई अन्य
रचना नहीं है।
हर्षचरित
हर्षचरित एक आख्यायिका है। बाण ने ग्रन्थ के आरम्भ में स्वयं कहा है—'करोम्य-
ख्यायिकाम्भोथौ जिह्वाप्लवनचापलम्' (श्लोक २०)। आचार्यों ने आख्यायिका का जो
स्वरूप निर्धारित किया है उसका समन्वय विशेष रूप से हर्षचरित में मिल जाता है।
प्रसंगतः हम कथा और आख्यायिका के भेद की चर्चा करेंगे। हर्षचरित एक ऐतिहासिक
काव्य है। यह कहा जा सकता है कि संस्कृत-साहित्य में ऐतिहासिक काव्य लिखने का
शुभारम्भ बाण के द्वारा ही हुआ। प्राचीन कवि ऐतिहासिक पुरुषों के चरित को
लेकर काव्य का निर्माण करने में सम्भवतः अपनी हीनता समझते थे। सामान्य व्यक्ति
को काव्य का नायक बनाकर लिखना उनके विचार में शोभन न था। बाण ने हर्षचरित
लिख कर इस कलंक को मिटाने का प्रथम प्रयास किया। आगे चलकर कई ऐतिहासिक
पुरुषों के जीवनवृत्त पर कवियों ने अनेक चरित-काव्य लिखे। हर्षचरित आठ उच्छ्वासों
में विभक्त है। प्रथम सवा दो उच्छ्वासों में बाण ने आत्मकथा लिखी है और शेष में
सम्राट् हर्षवर्धन का चरित है। आरम्भ हर्ष के वंश-प्रवर्तक पुष्पभूति के वर्णन से किया
गया है। हर्ष के पिता का नाम प्रभाकरवर्धन और माता का यशोवती था। उनके बड़े
भाई का नाम राज्यवर्धन था। राज्यवर्धन का जन्म ५८८ ई० में हुआ। दो वर्ष के बाद
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हर्ष उत्पन्न हुए तथा तीन वर्ष के बाद राज्यश्री का जन्म हुआ। राज्यश्री का विवाह
ग्रहवर्मा से हुआ। ग्रहवर्मा मौखरि क्षत्रिय एवं अवन्तिवर्मा का पुत्र था। हूणों द्वारा
राज्य के उत्तर में आक्रमण किए जाने पर राज्यवर्धन एक बड़ी सेना लेकर उन्हें रोकने के
लिए गए। राज्यवर्धन लौटे न थे कि इधर प्रभाकरवर्धन का देहान्त हो गया। हर्ष की
माता यशोवती पति की मृत्यु होने से पूर्व ही चिता में बैठ कर सती हो गई। इधर
मालवा के राजा ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। ग्रहवर्मा को मार कर राज्यश्री
मालवाधिप के कैद में आ गई । राज्यवर्धन ने हर्ष को राज्य का भार देकर
शत्रु के विरुद्ध प्रयाण किया। उन्होंने मालवराज को परास्त कर दिया, परन्तु उसके
सहायक गौडाधिप ने धोखे से उन्हें मार डाला। हर्ष को बड़े भाई की असामयिक मृत्यु से
बहुत क्षोभ हुआ। प्रतिशोध के लिये उन्होंने प्रस्थान किया। मार्ग में उन्हें दिवाकरमित्र
नामक बौद्ध भिक्षु द्वारा अपनी बहन राज्यश्री का पता लगा जो बन्दीगृह से छूट कर
विन्ध्याटवी में भाग निकली थी। राज्यश्री के मिलने के बाद हर्षचरित समाप्त हो
जाता है।
इस प्रकार यह एक ऐतिहासिक तथ्य बाण की रचना में अलंकृत काव्यमय शैली में
आया है। जगह-जगह पर अलौकिक पात्रों और पौराणिक कथाओं का भी उपयोग किया
गया है। किसी घटना के तिथिक्रम का उल्लेख नहीं है। कुछ ऐतिहासिक पात्रों के नाम
का भी उल्लेख नहीं है। राज्यवर्धन को मारने वाले गौडाधिप का हर्षचरित में नामोल्लेख
नहीं किया है। इन कारणों से हर्षचरित के ऐतिहासिक महत्त्व के कम होने पर भी हर्ष के
समकालीन युग की सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के अध्ययन
के लिए हर्षचरित से बढ़ कर कोई दूसरा सहायक ग्रन्थ नहीं है। किसी का कहना कि
'हर्षचरित सभ्यता का विश्वकोश है' किसी अंश में अत्युक्ति नहीं। समकालीन संस्थाओं
का चित्र इस तरह हर्षचरित में निखर उठा है। हर्षचरित को अजन्ता के कलामण्डप से
सन्तुलित करना भी सर्वोशतः ठीक है। ह्वेनसांग के संस्मरणों और हर्षचरित के घटना-
क्रमों का ठीक-ठीक मेल हो जाने से हर्षचरित के महत्त्व का पता चलता है। इसके अतिरिक्त
संस्कृत-साहित्य के इतिहास की दृष्टि से भी हर्षचरित का महत्त्व है। आरम्भ में बाण ने
महाभारत, वासवदत्ता एवं बृहत्कथा नामक ग्रन्थों की तथा भास, कालिदास, प्रवरसेन,
भट्टार हरिचन्द्र एवं आढ्यराज नामक कवियों की प्रशंसा की है। बाण के स्थिति-
काल का निश्चय हो जाने से अन्य कवियों के स्थितिकाल के निर्णय में बड़ी सहायता
मिलती है।
हर्षचरित बाण की प्रथम रचना है। यद्यपि भाषा और भाव की दृष्टि से कादम्बरी
की तरह प्रौढ़ता हर्षचरित में नहीं, तथापि इन दोनों की अभिव्यक्ति-सामर्थ्य में अपूर्णता
भी कोई अभिलक्षित नहीं होती। बाण की स्फुरत्कलालापविलासकोमला कविता-नववधू
कादम्बरी में जो कौतुकाधिक राग उत्पन्न करती है, हर्षचरित में विवाह की योग्यता होने
पर भी अविवाहिता होने के कारण अज्ञातयौवना-सी लगती है। सम्भव है इसी कारण
वह कादम्बरी की तरह सहृदय-जनों में कौतुकाधिक राग उत्पन्न न कर सकी हो।
स्थान-स्थान पर बाण की अद्भुत वर्णनशक्ति का पूर्वाभास हर्षचरित में मिल जाता है।
पात्रालोचन
[ अब यहाँ संक्षेप में हर्षचरित के पात्रों के सम्बन्ध में जानना आवश्यक है। मुख्य पात्र
के रूप में सरस्वती, सावित्री, बाण, पुष्पभूति, भैरवाचार्य, प्रभाकरवर्धन, यशोवती,
राज्यवर्धन, हर्षवर्धन तथा राज्यश्री के चरित्र हर्षचरित में निर्दिष्ट हैं। अतः उन्हीं के
सम्बन्ध में अग्रिम वक्तव्य है ]
सरस्वती और सावित्री—सरस्वती वाणी की अधिष्ठात्री देवी और ब्रह्माजी की कुमारी
कन्या थी। विद्या की देवी होने के कारण और बालभाव की चपलता से अंशतः उसमें
कुछ अभिमान की मात्रा भी थी। दुर्वासा के स्वरहीन सामगान पर वह हँस पड़ी जिससे
उस क्रोधान्ध ऋषि के शाप से ग्रस्त हुई। दुर्वासा ने उसकी विद्याजनित उन्नति को चूर
करने के लिए नीचे मर्त्यलोक में चले जाने का शाप दे डाला। परन्तु सरस्वती ने ऋषि
के शाप को शिर झुका कर मान लिया। उसकी प्रिय सखी सावित्री ऋषि के इस अन्याय
को न सह सकी और स्वयं प्रतिशाप देने के लिए उद्यत हो गई। तब सरस्वती ने उसे
रोका और कहा—'सखी, तू अपना क्रोध शान्त कर, संस्कारशून्य बुद्धि होने पर भी ब्राह्मण
सर्वथा आदरणीय है।' सरस्वती की इस वाणी में उसकी अपार सहिष्णुता निहित है।
वह निरपराध होने पर भी कुछ नहीं बोलती और सावित्री को साथ लेकर मर्त्यलोक के
लिए ब्रह्मलोक से प्रस्थान कर देती है। ब्रह्मा जी ने उसके शाप को पुत्र का मुख देखने
की अवधि दी। सावित्री ने उसे बहुत ढाढस दिया और वे दोनों शोण के तट पर निवास
करने लगीं। वहीं पहुँचे हुए दधीच से सरस्वती का प्रणय हो गया। सरस्वती की अपेक्षा
सावित्री अधिक प्रगल्भ थी। सरस्वती मुग्धा और सावित्री प्रगल्भा थी। दधीच के प्रथम
दर्शन से आकृष्टहोने पर भी सरस्वती ने अपना प्रणय-भाव बिलकुल छिपाए रखा। उसके
चले जाने पर शून्य-शून्य सी रहने लगी। जब दधीच का कुशल-समाचार लेकर मालती
आई तब एकान्त में सरस्वती ने दधीच के प्रति अपना अनुराग व्यक्त किया। दधीच को
लाने के लिए मालती के चले जाने पर उसने सावित्री से यह रहस्य प्रकट कर दिया। इस
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प्रकार सरस्वती एक सहिष्णु, लज्जाशील नारी के रूप में चित्रित है और सावित्री का
चित्रण एक संवेदनशील नारी के रूप में हुआ है।
बाण—हर्षचरित के रचयिता बाण भी एक मुख्य पात्र हैं। मानना तो यह चाहिए
कि हर्षचरित दो विभागों में विभक्त आख्यायिका है। प्रथम भाग के मुख्य पात्र स्वयं
महाकवि बाण हैं और द्वितीय भाग के सम्राट् हर्षवर्धन । बाण ने अपने चरित्र का जितनी
धार्मिकता और स्पष्टता से चित्रण किया है उतना शायद ही हर्ष के चित्रण में हो। यद्यपि
यह बात नहीं फिर भी कवि ने अपना दोष और गुण सब एक तटस्थ पर्यवेक्षक के नाते
कह डाला है। बाण की तटस्थता इसी से व्यक्त होती है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में
'उत्तम पुरुष' के स्थान पर अन्य पुरुष का ही प्रयोग किया है। 'मैं उत्पन्न हुआ' के स्थान
पर 'बाण उत्पन्न हुआ, बढ़ा और यौवन के आरम्भ में आवारा (इत्वर) बन गया' आदि
साधारण पात्र के रूप में ही बाण ने अपने को रखा है। सम्भव था अगर उत्तम पुरुष 'मैं'
का प्रयोग करते तो अपने दोष-पक्ष के उल्लेख में इतनी स्पष्टता न होती। छोटी अवस्था
में ही बाण की माता मर गई। पिता ने ही किसी प्रकार पाल-पोस कर बढ़ाया। दुर्भाग्य
से जब बाण चौदह वर्ष का हुआ तभी उसके पिता भी दिवंगत हो गए। अब मातृ-पितृहीन
बाण को सुधारने वाला कोई नहीं मिला। मिले वही नाचने-गाने के शौकीन संगी-साथी।
उनके साथ रहने से बाण की स्वतन्त्रता बढ़ती गई और फलतः यौवन के आरम्भ में ही वह
आवारा (इत्वर) हो गया। इन्हीं साथियों के साथ यहाँ-वहाँ मारा-मारा फिरने लगा।
कभी किसी नगर में जाकर नाटक खेलता, कभी किसी नगर में। इस इत्वरवृत्ति ने
यद्यपि बाण को पितृ-पितामह द्वारा अर्जित विभव एवं अविच्छिन्न विद्या-प्रसंग से वंचित
कर दिया तथापि बाण ने अपने उसी भ्रमणशील जीवन में, जब उसकी लोग खिल्ली उड़ा
रहे थे, अनुभव के चार स्रोत पकड़ लिए थे। उसके अनुभव के प्रथम स्रोत राजकुल थे,
उनमें घूम-घूम कर वह उनके प्रत्येक कर्मचारी से मिलता और वहाँ के उदार व्यवहारों से
परिचित होता। दूसरा स्रोत उस समय के गुरुकुल थे, वहाँ जा-जा कर अध्ययन-अध्यापन
की विधियों को उसने खूब समझ लिया। तीसरा स्रोत गुणी जनों की गोष्ठियाँ मिलीं,
जिनमें उसने अनमोल बातें सुनीं। चौथा स्रोत सूझ-बूझ वाले विदग्ध जनों की मंडलियाँ
थीं, उसने उनमें भीतर घुस कर थाह ली। इस प्रकार वह अपने जीवन के अल्हड़पन
और घुमक्कड़ी प्रवृत्ति से अपनी आँखों देखा हुआ लोकजीवन का चौचक अनुभव पाकर
अपने घर वापस आया। तब उसके अन्दर जो पुस्तैनी प्रतिभा थी वह चमक उठी।
बाण स्वभावतः अपने भाई-बन्धुओं में हिल-मिल जाता था। उसे अपने गाँव में अपने
लोगों के बीच मोक्ष का आनन्द मिलता था। वह सम्राट् के पास से भी उस आनन्द के
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लिए चला आता था। अपनी इस प्रकृति से बाण बहुत अधिक जनप्रिय हो गया था।
उसमें नम्रता भी खूब थी। अपने बड़ों के सामने झुक जाता था। उसने अपनी
आरम्भिक जीवन की समस्त बुराइयों को जड़ से खोद कर निकाल दिया था और अनुभवी
होने के बाद स्वयं अपना निर्माण किया। यद्यपि बाण ने कादम्बरी में भर्तु या भत्सुं
नामक अपने गुरु का उल्लेख किया है, तथापि यह नहीं विदित होता कि बाण के जीवन के
निर्माण में भर्तुशर्मा का कितना हाथ था। बाण के व्यक्तित्व में दो बातें बड़े महत्त्व की थीं,
एक तो वह जन्म से ही स्वभावगम्भीर अर्थात् विस्तृत मेधाशक्ति वाला था, दूसरे वह
प्रत्येक वस्तु की जानकारी प्राप्त करने के लिए सदा उत्सुक रहता था। इन दोनों बातों
से बाण को मार्गस्थ होने में बड़ी सहायता मिली।
बाण के व्यक्तित्व की एक और विशेषता है, वह है उसका स्वाभिमान। वह जितना
नम्र था उतना ही स्वाभिमानी भी। वह किसी की परवा नहीं करता था। उसे क्या पड़ी
थी कि वह राजकुल में प्रवेश पाकर सेवा में हाजिरी बजाता और सेवकों जैसी चापलूसी
करता ? जब हर्ष के भाई कृष्ण ने अपने दूत द्वारा संदेश भेजा कि बिना समय गँवाए
राजकुल में पधारें तो बाण बहुत सोच में पड़ गया। कृष्ण के दूत ने संदेश में यह भी
कहा कि सेवा में झंझट सोच कर उदासीन न होना चाहिए। इससे प्रतीत होता है कि
बाण के स्वाभिमानी व्यक्तित्व से कृष्ण खूब परिचित थे। उन्हें डर था कि बाण कहीं सम्राट्
के पास आना अस्वीकार न कर दें। बाण से डाह करने वालों ने उसकी आरम्भिक
चाल-चलन की बात लेकर सम्राट् के कान भर दिये थी, जिसका परिमार्जन बड़े
प्रयत्न से कृष्ण ने कर दिया। बाण अपने अकारणबन्धु कृष्ण का संदेश सुन कर बहुत
सोच में पड़ गए। राजसेवा उन्हें कष्टप्रद लगती थी। राजदरबार में बड़े खतरे नजर
आते थे। न उनके पुरखों में किसी की इस तरफ रुचि रही, न उनके ही मन में ऐसी
बात थी कि वे राजकुल में जाकर बुद्धि-सम्बन्धी विषयों का आदान-प्रदान करें। न विद्वानों
की गोष्ठियों में बैठने की विलक्षण चतुराई ही उनके पास थी। चापलूसी से भी उन्हें बड़ी
चिढ़ थी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने जाने का निश्चय कर लिया। स्वाभिमान उन्हें
रोकता था, परन्तु जब यह ध्यान में आता कि सम्राट् कुछ ऐसा-तैसा मुझको समझ गए
हैं तो उनका स्वाभिमान उनको चलने के लिए ही प्रेरित करने लगा। स्वाभिमानी बाण
को यह कैसे सह्य होता कि दूसरा उसे हीन दृष्टि से देखे, जब कि वह हीन नहीं। अपनी
अहीनता का सम्यग्ज्ञान होने पर भी बाण में अहंकार का लेश भी न था। उन्हीं के निर्देश
से पता चलता है कि वे रूप-सम्पन्न थे, पर उनके मन में सुन्दर रूप से मिलने वाले आदर
२ ह० मू०
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की इच्छा न थी। उनमें प्रगाढ़ शास्त्रीय ज्ञान था लेकिन बुद्धि-सम्बन्धी विषयों पर लड़-
झगड़ के लिए दिखावा करने जाना वह सर्वथा व्यर्थ समझते थे।
जब सम्राट् हर्ष ने प्रथम बार बाण को देख कर हँसते हुए 'महानयं भुजङ्गः' कह डाला
तो बाण अपनी स्वतंत्र प्रकृति और स्वाभिमान से संवलित ब्रह्मतेज का संवरण न कर सके।
थोड़ी देर तक चुप रह कर उन्होंने पूछ ही डाला—'का मे भुजङ्गता ?' बाण का व्यक्तित्व
इस प्रकरण में जितना स्पष्ट खुल सका है उतना अन्यत्र नहीं। उस समय बाण को यह
सुध-बुध न थी कि वे महाराजाधिराज हर्षवर्धन के सामने खड़े हैं। उनका स्वाभिमान
तत्काल प्रज्वलित हो उठा था। जब कि बाण में अब कोई भुजंगपना न रह गया था तब
भी दूसरों के कान भर देने से केवल ऐसी निराधार कल्पना कर देना कहाँ तक उचित
था। उसने हर्ष से स्पष्ट कह दिया कि 'आप नेय की तरह बोलते हैं अर्थात् आपकी बुद्धि
दूसरों पर निर्भर करती है। आप मुझे साधारण व्यक्ति मत समझिए। मैंने वात्स्यायन
ब्राह्मणों के कुल में जन्म लिया है। सांगवेद का स्वाध्याय और अनेक शास्त्र भी सुने हैं।
विवाह हो जाने के बाद नियमित गृहस्थ हूँ। (इससे यह पता चलता है कि बाण उस
समय तक विवाहित हो गए थे और तभी से उनके जीवन में स्थिरता हुई)। यौवन के
आरम्भ में अवश्य ही मुझ में कुछ चपलताएँ थीं, इससे मैं इनकार न करूँगा, किन्तु वे
ऐसी थीं जिनका इस लोक या उस लोक में विरोध न हो।' बाण की इस वाणी में सचमुच
उनका ब्रह्मतेज निखर उठा है। फिर बाण अपनी नम्रता का अवलम्बन ले लेते हैं। बाण
ने अपने आप को खूब पहचाना था। वे अपनी कमजोरियों को अच्छी तरह समझ गए
थे और उन्हें हटाने का प्रयत्न भी करते थे। जैसा कि उन्होंने स्कन्धावार में दरबार से
लौटने पर सोचा था कि मुझे धिक्कार है यदि मैं अपने दोषों के प्रति अन्धा होकर केवल
अनादर की पीड़ा अनुभव करके इस गुणी सम्राट् के प्रति कुछ और सोचने लगूँ। अवश्य
ही मैं वह करूँगा जिससे यह कुछ समय बाद मुझे ठीक जान ले।
पुष्पभूति और भैरवाचार्य—पुष्पभूति ही हर्ष के वर्धनवंश के आदि संस्थापक थे।
वे शिव के अनन्य उपासक थे। उनके प्रभाव से घर-घर में शिव की पूजा होती थी। राजा
पुष्पभूति बेताल-साधना भी करते थे इस कार्य में उनका सहायक भैरवाचार्य नामक
दाक्षिणात्य महाशैव था। भैरवाचार्य से मिलन का वृत्तान्त यह है कि एक दिन उस राजा
के पास एक परिव्राट् आया। वह भैरवाचार्य का मुख्य शिष्य था। राजा के पूछने पर कि
'भैरवाचार्य कहाँ हैं?' उस शिष्य ने 'सरस्वती के किनारे शून्यायतन में ठहरे हैं'
यह कह कर पाँच चाँदी के कमल भैरवाचार्य की ओर से अर्पित किए। दूसरे दिन
पुष्पभूति ने पुराने देवी के मन्दिर के उत्तर बिल्ववाटिका में आसन लगाए भैरवाचार्य
को साक्षात् शिव की तरह देखा। भैरवाचार्य से राजा की मित्रता हो गई। भैरवाचार्य के
शिष्य ने ब्रह्मराक्षस के हाथ से छीन कर लाई हुई अट्टहास नामक तलवार राजा को अर्पित
की। राजा ने भैरवाचार्य की बेताल-साधना में बड़ी सहायता की। फलतः श्रीकंठ नाग
को हरा कर उसने लक्ष्मी को प्रसन्न किया। प्रसन्न लक्ष्मी द्वारा वर माँगने के लिए प्रेरित
किए जाने पर पुष्पभूति ने अपने प्रिय सुहृद् भैरवाचार्य की सिद्धि के लिए ही वर माँगा।
इससे पुष्पभूति की निःस्वार्थपरता व्यक्त होती है। लक्ष्मी ने उसे देकर राजा की शिव-
भट्टारक के प्रति अनन्य भक्ति देखकर वरदान में यह भी कहा—'तुम महान् राजवंश के
संस्थापक होगे जिसमें हरिश्चन्द्र के समान सर्वद्वीपों का भोक्ता हर्ष नाम का चक्रवर्ती जन्म
लेगा।' भैरवाचार्य विद्याधर के शरीर को प्राप्त हुआ। उसने राजा का बहुत बड़ा उपकार
माना। इस प्रकार पुष्पभूति के रूप में एक ऐसे व्यक्ति का चित्रण किया गया है जो परोप-
कार में ही जीवन को लगा देता है और स्वप्न में भी स्वार्थ का चिन्तन नहीं करता।
प्रभाकरवर्धन और यशोवती—पुष्पभूति के वंश में प्रभाकरवर्धन बड़ा प्रतापी
राजा हुआ। उसने सिन्धु, गान्धार, गुर्जर, लाल, मालव देशों पर विजय प्राप्त की थी।
हूणरूपी हिरन के लिए वह केसरी था। इस प्रकार वह स्थाण्वीश्वर के छोटे से राज्य
को बढ़ा कर महाराजाधिराज की पदवी से विभूषित हुआ। इसी कारण उसका दूसरा
नाम प्रतापशील था। प्रभाकरवर्धन अत्यन्त पराक्रमी होते हुए भी दयावान् था।
उसने मालवा के राजा के मारे जाने पर उसके अनाथ कुमारों के साथ मृदु व्यवहार
किया। वह सूर्य का भक्त था। उसकी रानी यशोवती थी। हर्षचरित में यशोवती के
चरित्र का चित्रण एक भारतीय पतिव्रता के रूप में हुआ है। रानी यशोवती के गर्भ से
ही राज्यवर्धन, हर्षवर्धन और राज्यश्री ने जन्म लिया। प्रभाकरवर्धन ने राज्यश्री
का विवाह बड़ी धूम-धाम से मौखरिवंशज अवन्तिवर्मा के ज्येष्ठ पुत्र ग्रहवर्मा के साथ
किया। राजा प्रभाकरवर्धन ने अपने योग्य पुत्र राज्यवर्धन को हूणों से युद्ध करने के
लिए भेजा। उसके पीछे-पीछे १४-१५ वर्ष की आयु वाला हर्ष भी कुछ पड़ावों तक गया, .
पर वह शिकार खेलने की रुचि से हिमालय की तराइयों में रुक गया। अचानक पिता की
बीमारी का समाचार पाकर हर्ष वहाँ से लौट आया। हर्ष के आने पर पति के मरने के
पूर्व ही रानी यशोवती ने अग्नि में प्रवेश कर भारतीय नारी के आदर्श का उज्ज्वल चित्र
प्रस्तुत किया। बाद में प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हुई।
राज्यवर्धन—एक आज्ञाकारी पुत्र, स्नेहशील भाई और शूर योद्धा के रूप में
राज्यवर्धन का चित्रण किया गया है। वह पिता की आज्ञा पाते ही हूणों के साथ युद्ध
करने के लिये चला जाता है। बालक हर्ष भी कुछ पड़ावों तक उसके साथ चलता है,
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पर हिमालय की तराइयों में आखेट के लिये रुक जाता है। जब तक राज्यवर्धन परदेश
से नहीं लौटा था, इसी बीच प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो गई और माता यशोवती भी न
रहीं। हर्ष ने राज्यवर्धन के पास खबर भिजवा दी। इधर हर्ष के मन में बड़ी भारी
चिन्ता यह होने लगी कि पिताजी का समाचार सुनकर बड़े भैया (आर्य) भी कहीं
बुद्ध की तरह आचरण न कर बैठें। कहीं राजर्षि राज्यवर्धन आश्रम में प्रविष्ट न हो जायें ?
कहीं वह पुरुष-सिंह किसी गुफा में न चला जाय। अनाथ पृथिवी को देखकर कहीं निरन्तर
अश्रुधारा प्रवाहित न करने लगें। प्रथम बार इस आपत्ति से विह्वल होकर आत्मचिन्तन
में न लग जायें। संसार को अनित्य समझकर पास आती हुई राज्यलक्ष्मी से विरक्त न
हो जायें। कहीं दुःखज्वाला का शमन करने के लिये जल में न डूब जायें। यहाँ लौटने
पर राजाओं के कहने पर पराङ्मुख न हो जायें। इस प्रकार हर्ष अपने मन में कल्पना
करते हुए राज्यवर्धन की बाट देखते रहे। भ्रातृप्रेम से अभिभूत हर्ष के मन के ये भाव
राज्यवर्धन के शम-प्रधान व्यक्तित्व की ओर संकेत करते हैं। लगता है राज्यवर्धन आरम्भ से
ही भगवान् बुद्ध के धर्म से आस्थावान् था। जैसा कि एक ताम्रपत्र के अनुसार उसे परम-
सौगत भी कहा गया है। हर्ष को भी उपर्युक्त चिन्ता में भी राज्यवर्धन में विरक्त होने के
पश्चात् बुद्ध के जीवन की झलक मिलती है। हर्ष को यह सन्देह था कि बुद्ध के समान
वे भी कहीं न चले जायें।
पितृ-शोक से अभिभूत होकर राज्यवर्धन जब लौटा तब यही घटना घटी। हर्ष से
उसने कहा—'तुम राज्यभार ग्रहण करो, मैंने आज शस्त्र छोड़ा।' और तलवार
हाथ से फेंक दी। राज्यवर्धन के इस कथन में उसकी निःस्पृहता, पितृप्रेम, भ्रातृप्रेम आदि
समस्त सद्प्रवृत्तियाँ एक साथ उमड़ पड़ीं हैं। इसी अवसर पर एक विचित्र घटना घट जाती
है। एक परिचारक ने आकर खबर दी कि सम्राट् के मरने की खबर सुनकर दुरात्मा मालव-
राज ने ग्रहवर्मा को जान से मार डाला और राज्यश्री को कान्यकुब्ज के कारावास में डाल
दिया। इस समाचार से तत्काल राज्यवर्धन का शोक जाता रहा, उसके स्थान पर क्रोध
प्रतिष्ठित हो गया। उसने हर्ष से कहा—'तुम राज्य सँभालो, मैं मालवराज के कुल का
नाश करने चला।' हर्ष ने जब यह कहा कि 'आर्य के प्रसाद से पहले भी मैं कभी वञ्चित
न रहा। कृपाकर मुझे भी साथ ले चलें।' तो राज्यवर्धन ने कहा—'तुम ठहरो, मुझे अकेले
ही शत्रु का नाश करने दो।' यह कहकर उसने उसी दिन शत्रु पर धावा बोल दिया।
राज्यवर्धन मालवराज की सेना को खेल ही खेल में जीत लेने पर भी गौड़ाधिप के
कुचक्र से मारा जाता है। हर्ष के हृदय में राज्यवर्धन के प्रति अपार स्नेह था। उसने
उसके मारे जाने का समाचार सुनकर उसकी चरण-रज का स्पर्श करके प्रतिज्ञा की—'कुद्ध
ही दिनों में यदि गौड़ाधिप को न मार डालूँ तो स्वयं जल कर भस्म हो जाऊँगा।' हर्ष-
चरित में राज्यवर्धन का व्यक्तित्व सर्वथा अकलुषित और स्नेह तथा पराक्रममय देखने
में आता है।
हर्षवर्धन—कहा जा चुका है कि वर्धनवंश के आदि संस्थापक राजा पुष्पभूति को
लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था—'तुम्हारे वंश में हरिश्चन्द्र के समान समस्त
द्वीपों का भोक्ता हर्ष नाम का चक्रवर्ती जन्म लेगा।' इसलिए यह स्वाभाविक था कि हर्ष के
समस्त गुण जन्मजात थे। जैसा कि बाण ने हर्ष के यशोवती के गर्भ में आते ही रानी का
वर्णन करते हुए लिखा है—उसके मन में यह दोहद इच्छा हुई कि चार समुद्रों का जल
एक में मिलाकर स्नान करूँ और समुद्र के वेला-कुंजों में भ्रमण करूँ। नंगी तलवार के
पानी में मुँह देखने की, वीणा अलग हटा कर धनुष की टंकार सुनने की और पंजर-
बद्ध केसरियों के देखने की इच्छा हुई। इस प्रकार हर्ष जन्म से ही एक महापुरुष था।
किसी ब्राह्मण ने ज्योतिष के अनुसार हर्ष के जन्म के समय भविष्यवाणी भी कर दी थी।
हर्ष में शैशव काल से ही अपूर्व रणोत्साह और साहस का आभास मिलने लगा था। जब
पिता ने अपने सुयोग्य पुत्र राज्यवर्धन को हूणों से भिड़न्त के लिए भेजा तो १४-१५ वर्ष
की अवस्था वाले हर्ष भी बड़े भाई के साथ चलने के उत्साह का संवरण न कर सके। कुछ
पड़ावों के बाद ही हर्ष का मन आखेट में लग गया तो वे आगे न जाकर हिमालय की
तराइयों में शिकार करने लगे। यहीं से हर्ष के जीवन का आकस्मिक परिवर्तन आरम्भ
हो जाता है। उन्हें पिता जी की बीमारी की खबर मिलती है। शीघ्र ही दौड़ पड़े, मार्ग में
कुछ भी नहीं खाया-पिया। इससे उनका अनन्य पितृ-प्रेम व्यक्त होता है।
राजद्वार पर पहुँचते ही उन्होंने उद्विग्न होकर सुषेण नामक वैद्यकुमार से पिता जी की
हालत पूछी। सुषेण ने कोई आशाजनक बात न कही तो घबड़ाए हुए पिता जी के पास
पहुँचे। उन्होंने उन्हें रुग्णावस्था में देखा। प्रभाकरवर्धन ने हर्ष को देख कर उठने की
चेष्टा की। उन्होंने बड़ी कठिनता से यह कहा—'हे वत्स, दुबले जान पड़ते हो।' तब भंडि
ने कहा कि हर्ष को भोजन किए हुए तीन दिन हो चुके हैं। यह सुन कर पिता ने गद्गद
कंठ से कहा—'तुम्हारे आहार ही के बाद मैं पथ्य लूँगा।' पिता का पुत्र के प्रति स्नेह
स्वाभाविक है, पर यहाँ स्वाभाविकता की सीमा पर वह स्नेह पहुँच गया है। गुणवान् पुत्र
के प्रति पिता का इससे बढ़ कर क्या भाव हो सकता है? हर्ष की गुणग्राहिता भी
असामान्य थी। जब उन्होंने सुना कि रसायन नामक वैद्यकुमार ने सम्राट् के प्रति भक्ति
और स्नेह से अभिभूत होकर आग में कूद कर जान दे दी तो उनकी प्रतिक्रिया यह हुई कि
उसने कुलपुत्रता धर्म को चमका दिया। स्वयं बाण ने हर्ष की गुणग्राहिता की प्रशंसा
( २० )
अपनी प्रथम भेंट के अवसर पर की थी। जब बाण ने अपना विशिष्ट परिचय दिया तब
हर्ष ने कहा था कि मैंने भी ऐसा ही सुना है। तब बाण ने एकान्त में हर्ष की उदारता एवं
गुणग्राहिता की प्रशंसा की है। अस्तु, इसी बीच जब प्रभाकरवर्धन मृत्युशय्या पर अन्तिम
सांस तोड़ने ही वाले थे तब हर्ष केजीवन की दूसरी मार्मिक घटना—माता यशोमती के सती
हो जाने की तैयारी सुनकर हुई। किसी प्रकार वे माँ को उनके निर्णय से विचलित न
कर सके। तत्पश्चात् पिता जी भी दिवंगत हो जाते हैं। इन उद्वेजक घटनाओं से हर्ष
अत्यन्त शोकमग्न अवस्था में पड़ गए। अनेक कुलपुत्र, गुरु, वृद्ध ब्राह्मण, मूर्धाभिषिक्त
अमात्य, मस्करी, मुनि, वेदान्ती तथा पौराणिक लोगों ने हर्ष के शोक को उदाहरणों और
दृष्टान्तों द्वारा कम किया। तब हर्ष के मन में राज्यवर्धन के विषय में अनेक विचार
आने लगे। कहीं बड़े भाई पिता जी के मरण का घातक समाचार सुन कर बुद्ध की तरह
आश्रम में न प्रविष्ट हो जायें ? हर्ष की यह भावना राज्यवर्धन के प्रति अपार भ्रातृ-प्रेम
और हृदय की पवित्रता को व्यंजित करने वाली है। सचमुच इस प्रकार की आन्तरिक
वृत्ति के कारण महानता की दृष्टि से हर्ष एक उच्च आदर्श का रूप धारण कर लेते हैं।
जैसा हर्ष ने राज्यवर्धन के विषय में मन में सोचा था, शोक से भरे हुए राज्य-
वर्धन ने आकर वही सोचा और अपनी तलवार फेंक दी। राज्यवर्धन के इस विचार से
हर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने अपने आप में ही कोई ऐसा दोष अनुभव किया
जिसके कारण राज्यवर्धन ने यह निश्चय कर डाला। हर्ष के उस विदीर्ण हृदय में कितनी
पवित्रता और विशालता थी। इसी बीच एक घटना और घटती है। मालवराज द्वारा
ग्रहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री के कारागार में बन्द होने की खबर तत्काल मिली।
सुनते ही राज्यवर्धन का विषाद जाता रहा. वे आग-बबूला हो गए। हर्ष को राज्यभार
सम्भालने के लिए कहा और स्वयं फिर हाथ में कृपाण उठा लिया। यहाँ भी हर्ष ने साथ
जाने के लिए आग्रह किया। राज्यवर्धन हर्ष के पराक्रम से परिचित थे, उन्होंने कहा—
'सारी पृथिवी को जीतने के लिए मान्धाता की तरह तुम धनुष उठाओगे, तो तुम ठहरो।
मुझे अकेले ही शत्रु का नाश करने दो।' यह कह उन्होंने प्रस्थान किया। जब हर्ष को
चौथी घटना यह सुन पड़ी कि एक मालवराज को खेल-खेल में पराजित कर लेने पर भी
राज्यवर्धन को धोखे से गौड़ाधिप ने मार डाला, तो उनकी क्रोधाग्नि फूट पड़ी। तब हर्ष
ने यह प्रतिज्ञा की—'यदि कुछ ही दिनों में इस पृथिवी को गौड़रहित न बना दूँ और
समस्त राजाओं के पैरों में बेड़ियाँ न पहना दूँ तो घी से धधकती हुई आग में पतंगे की तरह
अपने शरीर को जला दूंगा।' हर्ष की इस प्रतिज्ञा में उसका समस्त ओज प्रदीप्त हो उठा
है। युद्ध की तैयारियाँ होने लगीं। कुछ दिन बाद प्राग्ज्योतिषेश्वर कुमार ने हंसवेग के
( २१ )
साथ एक छत्र और अनेक उपहार भेजे। हर्ष के हृदय में प्रत्युपकार की भावना का यह
कितना सुन्दर प्रसंग है जब एकान्त में बैठे-बैठे उन्होंने यह सोचा—'आमरण मैत्री के
अतिरिक्त इस प्रकार के सुन्दर उपहार का बदला और क्या हो सकता है ?' भण्डि ने आ
कर राज्यश्री के विन्ध्याटवी में भाग जाने की खबर दी तो हर्ष स्वयं सब काम छोड़ कर
उसे खोजने निकल पड़े। बीच में शबर युवक निर्घात के माध्यम से दिवाकरमित्र नामक
एक बौद्ध भिक्षु से भेंट होती है। दिवाकरमित्र के एक शिष्य ने हर्ष को राज्यश्री का
पता बताया। अन्त में राज्यश्री मिल जाती है।
इस प्रकार हर्ष का व्यक्तित्व आदि से अन्त तक निर्भीक और साहसी, कर्त्तव्यपरायण
और स्नेहमय मिलता है। बाण ने सम्राट् के उदात्त जीवन का बहुत नजदीक से अध्ययन
किया था। बाण की लेखनी के स्पर्श से हर्ष के व्यक्तित्व की जो परिस्फूर्ति हर्षचरित में
दिखाई देती है वह अपूर्व है। यह कहना कठिन है कि बाण की लेखनी ने हर्ष का स्पर्श
कर इतनी सामर्थ्य प्राप्त की अथवा हर्ष का व्यक्तित्व ही बाण की लेखनी के स्पर्श से समृद्ध
हो गया। इसमें सन्देह नहीं कि हर्ष जैसा सम्राट् भारतवर्ष में कोई दूसरा नहीं हुआ।
हर्ष की महती सफलता तो इसमें भी अभिलक्षित होती है कि उसने परस्परविरोधी, साम्प्र-
दायिक तथा धार्मिक वातावरण को भी एक सन्तुलित रूप दिया था। हर्ष किसी एक धर्म
और एक सम्प्रदाय का पक्षपाती न था। उसके मन में सबके प्रति समान आदरभाव था।
बाण ने एक तटस्थ दर्शक के रूप में ही उसके व्यक्तित्व का चित्रण किया है। व्यर्थ प्रशंसा
का पुल बाँधना बाण जैसे स्वाभिमानी के लिए कहाँ तक सम्भव था।
हर्ष के व्यक्तित्व की यह प्रसंगतः सामान्य चर्चा है। ग्रन्थ के आद्योपान्त अवलोकन से
ही पाठक उसकी विशेषताओं से परिचित हो सकेंगे। बाण की चित्रग्राहिणी प्रतिभा में
हर्ष के व्यक्तित्व का चित्र ऐसी स्वाभाविकता से आलिखित है कि देखते ही बनता है।
राज्यश्री—यह हर्ष की छोटी बहन थी। वह नृत्य, गीत आदि कलाओं में प्रवीण थी।
प्रभाकरवर्धन ने धूम-धाम से ग्रहवर्मा के साथ उसका विवाह किया। पिता के मरते ही
राज्यश्री पर भी दुर्भाग्य के बादल उमड़ आए। मालवराज ने ग्रहवर्मा को जान से मार
दिया और उसे कान्यकुब्ज के कारागार में बन्द कर रखा। वह किसी तरह बन्धन से छूट
कर परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई। जब वह वहाँ अग्निप्रवेश करने
के लिए तैयार थी तब हर्ष उसे ढूँढते हुए पहुँच गए। इस अवस्था में सहसा भाई को
पाकर वह विलाप करने लगी। हर्ष ने रोते हुए कहा—'अब धीरज धरो, अपने को
सम्हालो।' राज्यश्री पर इस समय दुःख का पहाड़ टूट पड़ा था, हर्ष ने मृत्यु के मुख से
खींच कर उसे बचा लिया। वह अपने सतीत्व की रक्षा के लिए शत्रु के कारावास से भी
( ५२ )
भाग निकली। भारतीय नारी का यह उच्च आदर्श राज्यश्री में एकान्ततः प्रस्फुरित होता
है। बौद्धभिक्षु आचार्य दिवाकरमित्र के सामने राज्यश्री ने हर्ष से विनय-पूर्वक काषाय
वस्त्र धारण की अनुज्ञा मांगी। एक विधवा के तपस्वी जीवन के लिए आत्मसंयम के
अतिरिक्त और दूसरा क्या कर्तव्य रह जाता है। हर्ष ने भाई के वध का बदला लेने की
जो प्रतिज्ञा की थी उसे सुनाकर तत्काल राज्यश्री को ऐसा न करने के लिए कहा। उन्होंने
भिक्षु दिवाकरमित्र से कह दिया कि प्रतिज्ञा पूरी होने पर मैं और यह एक साथ काषाय
ग्रहण करेंगे। तब राज्यश्री ने भाई की बात पर आग्रह नहीं किया।
इस प्रकार इन प्रमुख पात्रों की चर्चा के साथ ही हर्षचरित का कथानक भी बहुत
अंश में सामने आ जाता है।
कादम्बरी
महाकवि बाणभट्ट की दूसरी 'अतिद्वयी' रचना कादम्बरी है। यह एक कथा है।
आधुनिक परिभाषा में कथा को ही उपन्यास कहते हैं। यद्यपि कथा और उपन्यास में
बहुत अन्तर है, तथापि काल्पनिकता का सम्बन्ध दोनों में एक-सा अभिलक्षित होता है।
आधुनिक उपन्यास कथा का विकसित रूप है और कथा उपन्यास का पूर्व रूप। कादम्बरी
संस्कृत-साहित्य की सर्वोत्कृष्ट गद्य-रचना है और बाण की अमर कृति है। 'हर्षचरित इस
पृथिवी-लोक की तथ्यात्मक आख्यायिका है पर कादम्बरी दिव्य-लोक को भूतल पर लाने
वाली काव्य-कल्पना है।' यह दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है बाण हर्षचरित की
अपेक्षा कादम्बरी में अधिक सफल हुए हैं। कादम्बरी की कथा के सम्बन्ध में यह मान्यता
है कि यह गुणाढ्यकृत बृहत्कथा से ली गई है। गुणाढ्य ने बृहत्कथा को पैशाची भाषा में
लिखा था, जो अब तक उपलब्ध नहीं है। उसके संस्कृत अनुवाद के रूप में क्षेमेन्द्रकृत
बृहत्कथामंजरी और सोमदेवकृत कथासरित्सागर में कादम्बरी-कथा का मूल रूप सुरक्षित
है। भारतीय प्राचीन साहित्य के उपजीव्य तीन ग्रन्थ विशेष रूप से रहे हैं—रामायण,
महाभारत और बृहत्कथा। अतः सम्भव है कि बाण ने अपनी कथा की मूल घटनाएँ
बृहत्कथा से ली हों, किन्तु यह निर्विवाद है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे एक सर्वथा
नवीन और मौलिक रूप दे दिया है।
कादम्बरी की कथा संक्षेप में इस प्रकार है—'विदिशा के राजा शूद्रक के समीप एक
चाण्डालकन्या पंजरबद्ध आश्चर्यकारी शुक को उनकी सेवामें अर्पित करती है। यह
शुक अपने जन्म से लेकर महर्षि जाबालि के आश्रम में पहुँचने तक का वृत्तान्त सुनाता
है। महर्षि जाबालि शुक के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं—उज्जयिनी के राजा तारापीड़
( २३ )
थे। उनको रानी विलासवती थी। उनके गुणवान् महामन्त्री शुकनास थे। बड़ी प्रतीक्षा
के बाद राजा को एक पुत्र होता है। उसी समय शुकनास की पत्नी मनोरमा के गर्भ से
भी पुत्र होता है। राजा के पुत्र का नाम चन्द्रापीड़ था और शुकनास के पुत्र का नाम
वैशम्पायन। दोनों ने एक साथ गुरुकुल में अध्ययन किया। दोनों दिग्विजय के लिए
सेना लेकर निकल पड़े। राजकुमार चन्द्रापीड़ एक बार किन्नर-मिथुन का पीछा करने हुए
बहुत दूर अच्छोद नामक सरोवर के समीप पहुँच गए। वहाँ महाश्वेता नामक एक
तपस्विनी गन्धर्वकन्या मिलती है। पूछने पर अवगत हुआ कि उसका अभीप्सित प्रिय
पुण्डरीक मिलने के पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। प्रिय के भावी मिलन की आशा में वह
अच्छोद सरोवर के किनारे रहने लगी थी। उसकी सखी कादम्बरी ने भी कौमार्यव्रत
धारण किया था। वह चन्द्रापीड़ को कादम्बरी के पास ले जाती है। वहाँ प्रथम साक्षात्कार
में ही चन्द्रापीड़ और कादम्बरी दोनों अनुरक्त हो जाते हैं। चन्द्रापीड़ फिर लौट कर
अपने स्थान पर आते हैं। वहाँ से पिता का पत्र पाकर अकेले घर आ जाते हैं। घर से
फिर स्कन्धावार पहुँच कर वैशम्पायन को वहाँ न देख दौड़े-दौड़े महाश्वेता के पास जाते
हैं। महाश्वेता ने जब यह कहा कि मुझसे उसने प्रणययाचना की तो मैंने उसको शुक बना
दिया, तो इस प्रकार अपने सुहृद की आपत्ति से चन्द्रापीड़ के प्राण निकल जाते हैं। वहाँ
कादम्बरी भी पहुँचकर चन्द्रापीड़ के पुनः मिलन की आशा से उनके शवशरीर की सेवा
करती है। यहाँ जाबालि की कथा समाप्त हो जाती है।
तब शुक ने शूद्रक से कहा कि मैं जाबालि के आश्रम से महाश्वेता के लिए उड़ चला
तो बीच ही में चाण्डालकन्या ने पकड़ कर मुझे आप के समीप ला दिया। तब चाण्डाल-
कन्या ने कहा कि मैं लक्ष्मी हूँ, यह शुक पुण्डरीक है और आप चन्द्रापीड़ हैं। शूद्रक को
कादम्बरी का प्रेम स्मृत हो उठा। उनके प्राण निकल गए और उधर चन्द्रापीड़ जीवित हो
गए। शुक की आत्मा भी पुण्डरीक के मृत शरीर में जाकर पुनः मिल गई, जो चन्द्रलोक
में सुरक्षित था। तत्पश्चात् महाश्वेता और पुण्डरीक, कादम्बरी और चन्द्रापीड़ सब एकत्र
हो गए और विवाहित होकर सुख-पूर्वक रहने लगे।
इस प्रकार कादम्बरी अनेक अप्राकृतिक घटनाओं से भरी होने पर भी कुतूहल उत्पन्न
करने में अपूर्व है। उत्सुकता तो कथा के आरम्भ में चण्डालकन्या द्वारा शूद्रक की सभा
में वैशम्पायन शुक के लाए जाने से ही लेकर आरम्भ हो जाती है और पाठक को बरबस
आगे बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कथा की प्रधान नायिका कादम्बरी बड़ी लम्बी
चड़ान के बाद मिलती है। अनेक उपकथाएँ भी साथ-साथ चल पड़ती हैं जो कथा के
सूत्र में पुष्टि लाने का काम करती हैं। महाश्वेता की प्रणयकथा कादम्बरी की प्रणयकथा
प्रथम उच्छ्वास: सरस्वती शाप व वात्स्यायन कुल
के अन्तर्भुक्त होने पर भी अपना अस्तित्व अलग रखती है। कादम्बरी एक मुग्धा नायिका
है जो सिर्फ प्रणय करना जानती है, महाश्वेता तपी हुई वनिता है जो प्रणय के सच्चे मार्ग
पर कादम्बरी को प्रतिष्ठित करने में सहायक होती है। कादम्बरी से महाश्वेता का व्यक्तित्व
किसी अंश में दुर्बल नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि कादम्बरी बिलकुल एक कठपुतली
रह गई है। वह सबके प्रभाव से अलग होकर अपने प्रणय का अस्तित्व बनाने में अत्यन्त
निपुण है। आरम्भ में उसका वासना-जनित प्रेम भी आगे चल कर विरह-तप्त होकर
महाश्वेता के प्रणय के समान ही पवित्र बन गया। आरम्भ से अन्त तक कादम्बरीकथा
अनेक प्रकार की विविधतापूर्ण घटनाओं से भरी होने के कारण कवि के वस्तुविन्यास-
कौशल का परिचय देती है।
बाण के चरित्र-चित्रण की अपनी विशेषता है। जैसा कि हम हर्षचरित में देख चुके
हैं उसी प्रकार कादम्बरी के भी सभी पात्र सजीव बन पड़े हैं। नवयुवक चन्द्रापीड़ जो
अपनी सौम्यता में, महाराज तारापीड़ जो अपनी उदारता में, आदर्श महामंत्री शुकनास
जो अपनी अगाध प्रवीणता में, रानी विलासवती जो अपनी सुकुमारता में, छाया की
भाँति चन्द्रापीड़ का अनुसरण करने वाली पत्रलेखा अपनी तत्परता में, कठोर कपिंजल
अपनी स्नेहमयता में कादम्बरी के जीते-जागते पात्र हैं जो पाठक के मन पर अमिट छाप
छोड़ जाते हैं। कादम्बरी के चित्रण में बाण ने भावों के सम्बन्ध में अपने मार्मिक निरीक्षण
का अपूर्व परिचय दिया है। कादम्बरी के समस्त भाव सहृदय और समीक्षक पाठक के
लिए अलग से अध्ययन के विषय हैं। बाण के मौलिक कवित्व का साक्षात्कार इन्हीं विषयों
में होता है।
<br/>
( २४ )
के साथ कादम्बरी के पद-पद में भीन गए हैं। यही कारण है कि कवि की सफलता हर्ष-
चरित की अपेक्षा कादम्बरी में अधिक समझी जाती है। हर्षचरित में जो सेनापति
सिंहनाद का उपदेश है उसकी कोटि में कादम्बरी का शुकनासोपदेश कितना विस्तृत और
पूर्ण बन गया है। ऐसा लगता है जैसे महर्षि व्यास ने महाभारत के एक अतिरिक्त प्रकरण
में गीता को उपनिबद्ध कर दिया है वैसे ही महाकवि बाण ने शुकनासोपदेश के नाम से
एक अतिरिक्त रचना ही कादम्बरी में उपनिबद्ध कर दी हो।
कादम्बरी शताधिक वर्णनों का अद्भुत संग्रह है। डा० वासुदेवशरणजी अग्रवाल के
शब्दों में कादम्बरी में बाण की वर्णन-क्षमता का मृदीकापाक हुआ है। बाण की चित्र-
ग्राहिणी प्रतिभा वर्णनों में वर्णनातीत सफल हुई है। कादम्बरी में बाण ने नदी, वन,
वृक्ष, सरोवर, नगर, सायं-प्रातः, चन्द्रोदय, धूलिपटल, राजकुल, इन्द्रायुध अश्व आदि के
वर्णनों में बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया है। व्यक्ति के चित्रण में, उसके सौन्दर्य की सूक्ष्मतम
कलना में बाण के अतिरिक्त कौन सफल हो सकता है? यद्यपि संस्कृत-साहित्य में वर्णनकर्ता
कवियों की कमी नहीं है, कालिदास का तो कहना क्या ? लेकिन बाण विस्तार-प्रधान वर्णन
के पक्षपाती हैं। कालिदास जिस चित्र को थोड़े में ही अंकित कर सके हैं उसे बाण ने भव्य
रूप देकर बड़ा बना दिया है। यही कारण है कि कालिदास के पश्चात् सर्वाधिक मौलिकता
बाण की अपेक्षा अन्य को नहीं मिली। बाण की दृष्टि में किसी विशेष वर्णन में पक्षपात
नहीं दिखाई देता। बाण जिस सूक्ष्मता से धवलदेहकान्तिप्रतिमण्डिता महाश्वेता का वर्णन
करते हैं उसी सूक्ष्मता से नीलम की पुतली के समान काली-कलूटी चाण्डालकन्या का भी
वर्णन करते हैं। अपेक्षाकृत बाण के वर्णन प्रातःकाल से अधिक सायंकाल के ही मिलते हैं।
सम्भव है प्रातःकाल की अपेक्षा सायंकाल का दृश्य ही उनको अधिक पसंद था। नगरी
उज्जयिनी के वर्णन से जाबालि के शान्त और पवित्र आश्रम का वर्णन भी कम अद्भुत
नहीं। कादम्बरी के सौन्दर्य-वर्णनों में भी कम आकर्षण नहीं। मानवी सौन्दर्य का वर्णन
और तद्वाची शब्दों की विकसित सामग्री भी कालिदास से कहीं अधिक बाण की इस
रचना में मिल जाती है। इसके अतिरिक्त इन्द्रायुध अश्व के सजीव वर्णन से बाण को
'तुरङ्गबाण' की पदवी भी मिली है। बाण के साहित्य के प्राण वर्णन ही हैं। उन्हें अलग
कर देने पर कथा कुछ भी न रह जायगी।
बाण अत्यन्त परिहास-प्रिय व्यक्ति थे। कादम्बरी के चंडिका-मन्दिर के बुड्ढे पुजारी
के वर्णन में उनकी परिहास-प्रियता का पता चलता है। उस पुजारी के वर्णन में बाण ने
खुलकर मजाक किया है। 'देवी के चरणों पर बार-बार माथा रगड़ने से उसके माथे पर
( २६ )
'घट्टा पड़ गया था। किसी कठबैद द्वारा दिए हुए सिद्धांजन से उसकी एक आँख फूट गई
थी इसलिए वह दूसरी आँख में प्रतिदिन तीन बार अंजन लगाता था जिससे लकड़ी की
सलाई भी घिस कर चिकनी हो गई थी। रेशम के कोये का छल्ला पैर के अँगूठे में मढ़
लेने के कारण उसकी काट से अंगूठा घायल हो गया था। पिशाच चढ़े हुए लोगों का भूत
उतारने के लिए वह मंत्र पढ़कर पीली सरसों से बार-बार उन्हें मारता तो वे भी उसकी
ओर लपक कर लप्पड़ मारते जिससे उसका कान दब कर चपटा हो गया था। वह दिन
भर मच्छर की तरह भनभनाता हुआ सिर हिला कर कुछ गुनगुनाता रहता था। वह
लाचारी ब्रह्मचारी था, अतएव जब दूर जगहों से आकर ठहरी हुई बुड्ढी तापसियों
को देखता तो ताव खा-खा कर स्त्रीवशीकरण चूर्ण का उन पर प्रयोग करता था। कभी
आए हुए बटोइयों को वहाँ न ठहरने देने के लिए उनसे जूझ जाता और तब वे भी
बिगड़ कर उसके साथ गुत्थम-गुत्था करने लगते और उसे पटक कर उसकी पीठ चटका
देते। रतौंधी के कारण वह दिन में ही आ-जा लेता। उसका पेट् निकला हुआ था और खाने
की कोई थाह न थी। फागुन में जब लोगों को मस्ती चढ़ती तो वे मचियासहित किसी बूढ़ी
दासी को उठा ले आते और उसके साथ ब्याह रचा कर उसकी ठठोली करते।' इस प्रकार
बाण के इस बुड्ढे पुजारी को देख कर मन में रस भर आते हैं। हास्य, बीभत्स और
भयानक का जीता-जागता चित्र बाण ने यहाँ देकर अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन-किया है।
कादम्बरी का एक प्रसंग बहुत ही आश्चर्यकारी है जहाँ बाण की कथा-निर्माणक्षमता
का अनुमान सहज ही होने लगता है। जब महाश्वेता के साथ चन्द्रापीड़ कादम्बरी के
यहाँ भवन में जाकर ताम्बूल द्वारा उससे सम्मानित होते हैं। तत्पश्चात् उस समय कथा-
क्रम शिथिल होता प्रतीत होता है। सबके सब चुपचाप यथास्थान बैठते हैं। कादम्बरी,
चन्द्रापीड़, महाश्वेता एवं और सब उपस्थित सखी और परिजनों के लिए इस समय ऐसे
हल्के झोंके की आवश्यकता थी कि जिससे फिर वे अपनी स्वाभाविक स्थिति प्राप्त कर
सकें। बाण ने वहाँ सहसा एक सारिका और परिहास नामक शुक के झगड़े का प्रसंग
लाकर कथा के प्रवाह को विलक्षण युक्ति से सम्हाल लिया है। चन्द्रापीड़ ने इस प्रसंग में
नर्म-भाषित करके सबको प्रभावित कर लिया। वहाँ का वातावरण उन पर हावी न हो
सका। वहाँ के लोगों और चन्द्रापीड़ में अपरिचयकृत दूरी हट गई और वे उन सबके
ऊपर प्रभावशाली हो गए तथा परस्पर सबके निकट आ गए। इस प्रकार बाण की लेखनी
कथा के वस्तु-विन्यास-वर्णनों के संवर्धन एवं मानस भावों के अंकन में सर्वत्र जागरूक रहती
है। वर्णनों की भरमार से कथा-प्रवाह के शिथिल प्रतीत होते हुए भी उनकी सरसता
एवं चित्रमयता से पाठक को किसी प्रकार का उद्वेजन नहीं हो पाता। वह कथा के अग्रिम
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मोड़ से परिचित होने के लिए उत्सुक होकर भी तत्काल वर्णनों के भीतर इतना डूब
जाता है कि कथा की ओर से उसका ध्यान हट जाता है। इसे बाण की अपनी विशेषता
समझनी चाहिए।
यह पहले कहा जा चुका है कि कादम्बरी का उत्तर भाग बाणभट्ट के सुयोग्य पुत्र की
रचना है। सौभाग्य की बात है कि उत्तरभाग भी बाणरचित पूर्वभाग की तरह ही बन गया
है। सम्भव था बाण कुछ और विस्तृत करके लिखते। उत्तरभाग को देख कर ऐसा लगता
है कि अगर भूषणभट्ट या पुलिन्द(न्ध)भट्ट ने अपना नाम बिना लिखे ही कादम्बरी की
पूर्ति कर दी होती तो निश्चय ही यह किसी के लिए निर्णय करना कठिन हो जाता कि
पूरी रचना एक ही कवि की है या नहीं। हाँ, इतना तो लोग अवश्य कहते कि बाण अन्त
में चल कर हड़बड़ा गए और कथा को शीघ्र समाप्त कर डाला। कहीं उत्तर भाग में भी पूर्व-
भाग के टक्कर की रचना हो गई है। फिर भी बाण-पुत्र यह कहते हुए तनिक भी रुकते
नहीं कि मैंने पिता की वाणी के समुद्रगामी प्रवाह में अपनी वाणी की धारा मिला दी
जिससे कथा समाप्ति को प्राप्त हो सके। उनका यह कथन सर्वथा सत्य है। बाण की धारा
में मिल पाने से ही उनकी वाणी यह काम कर सकी, अन्यथा बाण-जैसे वर्णनशिल्पी के
सामने किसी दूसरे का डट पाना कभी सम्भव न था। बाण-पुत्र में कुछ-कुछ कवित्व का
जो गुण था वह उनके पिता के आशीर्वाद का ही फल था। उन्होंने कादम्बरी के सम्बन्ध
में कहा है—
कादम्बरीरसभरेण समस्त एव मत्तो न किञ्चिदपि चेतयते जनोऽयम् ।
भीतोऽस्मि यन्न रसवर्णविवर्जितेन तच्छेषमात्मवचसाऽप्यनुसन्दधानः ॥
अर्थात् कादम्बरी (एक प्रकार की मदिरा तथा कादम्बरीकथा) के उत्तम रस को
पीकर सहृदय जनों का वर्ग बिलकुल छक कर अपनी सुध-बुध खो बैठा है। ऐसी स्थिति में
रस और वर्ण से विहीन अपनी वाणी द्वारा कादम्बरी की पूर्ति करते हुए मुझे कुछ भय
नहीं, क्योंकि बेहोशी में किसी को पता न चलेगा।
बाण की दृष्टि में काव्य का स्वरूप
बाण की शैली जानने से पूर्व हमें बाण के विचार में काव्य के स्वरूप को जान लेना
चाहिए। बाण काव्य के स्वरूप के संबन्ध में अपनी अलग दृष्टि रखते हैं, जैसा कि हर्ष-
चरित के आरम्भ में उन्होंने समझाया है। बाण को उन कवियों की कविता पसंद न थी
जो राग-द्वेष से भर कर मनमाने ढंग से बकवास करते हैं। बाण के अनुसार ऐसे 'वाचाल'
और 'कामकारी' लोग ही कुकवि हो जाते हैं। नई वस्तु उत्पन्न करने वाला ही सच्चे अर्थ
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में कवि कहलाने योग्य है और वही 'उत्पादक' है । बाण केवल स्वभावोक्ति ( जाति ) के
पक्षपाती न थे । प्रायः उन दिनों साहित्य में कविता के नाम पर प्रचुर मात्रा में स्वभा-
वोक्तिशैली का प्रचलन था । बाण की प्रतिक्रिया यह थी कि स्वभावोक्ति किसी प्रकार
भी कविता नहीं हो सकती; क्योंकि उसमें नवीनता का सर्वथा अभाव रहता है । आगे
चल कर अलंकारशास्त्र के आचार्यों ने वक्रोक्तिवाद को खड़ा करके बाण के निर्दिष्ट मार्ग
का अनुसरण किया । स्वभावोक्ति एक अलंकारमात्र तक सीमित रह गई । वस्तु के यथार्थ
रूप में कोई आकर्षण नहीं रहता, अन्यथा कविता लिखने की कोई आवश्यकता ही नहीं ।
कवि वस्तु के यथार्थ रूप को बदल डालता है और अपनी प्रतिभा से नई वस्तु का निर्माण
करता है, यही बाण का अभिप्रेत पक्ष था । वक्रोक्ति ने श्लेषप्रधान शैली को उत्पन्न किया ।
श्लेषपूर्ण शैली का काव्य-निर्माण भी चल पड़ा । उसकी झलक बाण के पूर्ववर्त्ती सुबन्धु की
प्रत्यक्षरश्लेषमय रचना वासवदत्ता में मिलती है । यह शैली बाण को भी पसंद थी । कादम्बरी
में उन्होंने लगातार श्लेषों से भरी हुई ( निरन्तरश्लेषघना ) शैली की प्रशंसा की है ।
वस्तु की भावात्मक रचना में जब तक शब्दों की मरोड़ से उत्पन्न नवत्य का साक्षात्कार
नहीं मिलता तब तक कवि प्रशंसा के पात्र नहीं, सम्भवतः बाण की यही दृष्टि थी । यह
भी बात नहीं कि जाति या स्वभावोक्ति शैली बाण को सर्वथा अनभिमत थी, उन्होंने
अग्राम्या जाति की प्रशंसा की है, अर्थात् वह स्वभावोक्ति जो केवल वस्तु के यथार्थ रूप
का चित्रण न होकर सुन्दरतापूर्ण चित्रण हो, बाण को सर्वथा मान्य थी ।
बाण कविता में समन्वय दृष्टि के पक्षपाती थे । वे एकांगी दृष्टि को कविता के लिए
उपयुक्त नहीं मानते थे । उन दिनों प्रायः पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के कवि लोग एकांगी
दृष्टि से काव्य लिखते थे, जैसा कि बाण ने स्वयं निर्देश किया है—
श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् ।
उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ॥ ( हर्ष० )
अर्थात् उत्तर के लोगों में श्लेष-प्रधान शैली में रचना करने की प्रवृत्ति है, पश्चिम के
लोग अर्थमात्र पर ध्यान देते हैं, भाषा कैसी भी हो अर्थ बढ़िया होना चाहिए । दाक्षिणात्य
लोग उत्प्रेक्षा करने में खूब पड़ हैं, उत्प्रेक्षाशैली उड़ान भरना या हद तक कल्पना करना
है, गौड़ देश के निवासी कवियों में अक्षराडम्बर ही खूब चलता है । अक्षराडम्बर अर्थात्
विकट शब्दों की योजना का आनुप्रासिक प्रवृत्ति से तात्पर्य है । इस प्रकार चारों ओर
साहित्यिक समाज में एकांगी दृष्टि से काव्य-निर्माण की प्रवृत्ति चल पड़ी थी जो बाण को
अभिप्रेत न थी । बाण कविता में सब शैलियों का समन्वय मानते थे । बाण की दृष्टि में
बढ़िया काव्य वह है जिसमें पाँच बातों का मेल हो—