हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
by महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री
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Read in contextऔर जब यह बात मन में आती है कि कभी भी हमें तत्तत् कवियों और आचार्यों के
जीवन के सम्बन्ध में जानने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होगा तब वही उत्सुकता एक गहरी
निराशा के रूप में बदल जाती है। सौभाग्य से बाण के सम्बन्ध में हम ऐसा नहीं सोच
सकते क्योंकि उन्होंने हर्षचरित के आरम्भिक दो-तीन उच्छ्वासों में अपने अल्हड़ जीवन
की मौलिक घटनाओं का उल्लेख वंशानुकीर्तन की भूमिका में क्रम से प्रस्तुत कर दिया है।
बाण का स्थितिकाल निःसन्देह रूप से सप्तम शती का पूर्वार्ध (६०६-६४८ ई०) है।
हर्ष का समय निश्चित होने के कारण इस सम्बन्ध में कोई ऐतिहासिक वैमत्य नहीं है।
बाण का वात्स्यायन वंश
बाण ने हर्षचरित के आरम्भ में अपनी आत्मकथा के साथ-साथ अपने कुल का भी
पौराणिक शैली में उद्भव बताया है। बाण के जीवन से परिचित होने के लिए यह सामग्री
बड़ी सहायक है। एक बार भगवान् ब्रह्मा इन्द्र आदि देवताओं के बीच कमल के आसन
पर विराजमान थे। वहाँ मनु, दक्ष, चाक्षुष प्रभृति प्रजापति एवं मुनिगण भी गोष्ठी में ब्रह्म
के सम्बन्ध में विचार कर रहें थे। ऋक्, साम, यजु का पाठ भी चल रहा था। वेद के
अर्थ के सम्बन्ध में परस्पर विवाद का भी प्रसंग उपस्थित हो जाता था। ऐसे अवसर पर
स्वभाव से ही अत्यन्त क्रोधी महामुनि दुर्वासा और उपमन्यु नामक मुनि में विवाद छिड़
गया। क्रोध से अभिभूत दुर्वासा ने सामगान करते हुए स्वर से हीन पाठ कर दिया।
दुर्वासा के स्वरहीन सामगान से एकाएक गोष्ठी के समस्त लोग सन्न हो गए और शाप के
भय से किसी को कुछ बोलने का साहस न हुआ। भगवान् ब्रह्मा ने भी इस भयावह
प्रसंग को टालने का प्रयास किया परन्तु उन्हीं के पार्श्वभाग में चामर लेकर खड़ी सरस्वती
दुर्वासा का स्वरहीन पाठ सुन कर हँस पड़ी। सरस्वती को अपने पर हँसते हुए देखकर
दुर्वासा क्रोध से तमतमा उठे और उन्होंने शाप देने के लिए हाथ में जल उठा लिया।
ब्रह्मा ने जोर से दुर्वासा को फटकारा, अत्रि ने स्वयं मना किया, सरस्वती की सखी सावित्री
ने भी क्रोध शान्त करने के लिए प्रार्थना की, फिर भी दुर्वासा ने किसी की न सुनी और
शाप दे ही डाला। ब्रह्मलोक को छोड़कर सरस्वती को तब तक अन्यत्र रहना होगा जब
तक वह अपने पुत्र का मुख न देख ले। दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर सरस्वती ने किसी
प्रकार सावित्री के साथ मर्त्यलोक के लिए प्रस्थान किया। स्वर्ग की गंगा के तटमार्ग से
होते हुए वह मर्त्यलोक में हिरण्यवाह शोण के समीप उतरी। सरस्वती ने शोण के तट पर
ही रहने के लिए आग्रह किया। दोनों ने नदी के तीर पर एक लतामण्डप में निवास
किया। शोण में नित्य स्नान और देवार्चन करते हुए कुछ दिन बीत गए।