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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 392

३५४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० २१ ।।
२-स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्रो यः शिप्रवान् वृषभो यो मतीनाम् । यो
गोत्रभिद्वज्रभृद्यो हरिष्ठाः स इन्द्र चित्राँ अभि तृन्धि वाजान्-ऋ० ६ । १७ । २ ।।
(सः) वह तू (ईं पाहि) प्राप्त वस्तु की रक्षा कर, (यः ऋजीषी तरुत्रः) जो तू
सीधे स्वभाव वाला और विजयी है (यः शिप्रवान्) जो तू सुन्दर ठुड्डी और नासिका
वाला है, (यः मतीनां वृषभः) जो तू विद्वानों में महाबली है, (यः गोत्रभित्
वज्रभृत्) जो तू पहाड़ों का तोड़ने वाला और वज्र रखने वाला है, (यः हरिष्ठाः)
जो तू मनुष्यों में बैठने वाला है, (सः इन्द्र) सो तू, हे इन्द्र ! [राजन्] (चित्रान्
अभि) अद्भुत व्यवहारों के लिये (वाजान् तृन्धि) संग्रामों का नाश कर ॥
३-एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीर्भिः ।
आविः सूर्य्यं कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूंरभिगा इन्द्र तृन्धि--अथ० २० ।
८ । १, ऋ० ६ । १७ । ३ ।। (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष] (प्रत्नथा
एव) पहिले के समान ही [हमारी] (पाहि) रक्षा कर, (ब्रह्म) ईश्वर वा वेद
(त्वा मन्दतु) तुझे हर्षित करे, [उसे] (श्रुधि) सुन (उत) और (गीर्भिः)
वेदवाणियों से (ववृधस्व) बढ़ । (सूर्य्यम्) सूर्य [सूर्य समान विद्या प्रकाश] को
(आविः कृणु) प्रकट कर, (इषः) अन्नों को (पीपिहि) प्राप्त हो, (शत्रून्
जहि) शत्रुओं को मार और [उनकी] (गाः) वाणियों को (अभि तृन्धि) सर्वथा
मिटा दे ॥
४-अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहुरयं सुतस्तस्य पिबा मदाय । उरुव्यचा जठर
आ वृषस्व पितेव नः शृणुहि हूयमानः-अथ० २० । ८ । २ । ऋग्० १ । १०४ । ६ ॥
[हे सभाध्यक्ष !] (अर्वाङ् आ इहि) सामने आ, (त्वा) तुझको (सोमकामम्)
ऐश्वर्य चाहने वाला (आहुः) वे कहते हैं, (अयं सुतः) यह सिद्ध किया हुआ [तत्त्वरस]
है, (मदाय) हर्ष के लिये (तस्य पिब) उसका पान कर । (उरुव्यचाः) बड़े सत्कार
वाला तू (जठरे) अपने पेट में [उसे] (आ वृषस्व) सींच ले, (पिता इव) पिता
के समान (हूयमानः) पुकारा गया तू (नः) हमारी (शृणुहि) सुन ॥
५-तवायं सोमस्त्वमेह्यर्वाङ् शश्वत्तमं सुमना अस्य पाहि । अस्मिन् यज्ञे
बर्हिष्या निषद्या दधिष्वेमं जठर इन्दुमिन्द्र-ऋ० ३ । ३५ । ६ ।। (इन्द्र) हे इन्द्र !
[बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष] (तव अयं सोमः) तेरा यह सोम [ऐश्वर्य कारक तत्त्व रस]
है, (त्वम् अर्वाङ् आ इहि) तू सामने आ, (सुमनाः) प्रसन्न चित्त तू (शश्वत्तमम्)
सदा ही (अस्य पाहि) इस [ऐश्वर्य] की रक्षा कर । (अस्मिन् बर्हिषि यज्ञे) इस
वृद्धिकारक यज्ञ [संगति व्यवहार] में (निषद्य) बैठ कर (इमम् इन्दुम्) इस इन्दु
[ऐश्वर्यकारक तत्त्व रस] को (जठरे आ दधिष्व) उदर में भली प्रकार धारण कर ॥
६-इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना ऋभुर्येभिर्वृषपर्वा विहायाः। प्रयम्य-
मानान् प्रति षू गृभायेन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्णः-ऋ० ३ । ३६ । २ ।। (इन्द्राय)
अत्यन्त ऐश्वर्य के लिये (सोमाः) उत्पन्न पदार्थ (प्रदिवः) बड़े प्रकाशमान (विदानाः)
प्राप्त होते हुये हैं, (येभिः) जिन [पदार्थों] के द्वारा (ऋभुः) बुद्धिमान् पुरुष