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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 389 of 600

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Page 389

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० २० ३५१
छन्द वाली हैं, उससे वे अग्नि देवता वाली ऋचायें हैं। (तस्मात् एताभिः त्रयम् अवाप्तं
भवति) इसलिये इन [ऋचाओं] से [इन्द्र, नाना देवता और अग्नि का] त्रित्व पाया
जाता है ॥ २० ॥
भावार्थः—विद्वानों [देवताओं] की स्तुति उनके गुण कर्म स्वभाव के अनुसार
होनी चाहिये ॥ २० ॥
विशेषः १—इस कण्डिका को ऐतरेय ब्रा० ६ । १० से मिलाओ ॥
विशेषः २—(वावेव) के स्थान पर (ह्यावेव) ऐतरेय ब्राह्मण से, और (जन्यावसू)
के स्थान पर (जेन्यावसू) पं० ब्रा० और वेद से शुद्ध किया है ॥
विशेषः ३—सङ्केत वाले मन्त्र अर्थ सहित यहाँ लिखे जाते हैं ॥
१—इदं ते सोम्यं मध्वधुक्षन्नद्रिभिर्नरः । जुषाण इन्द्र तत् पिब—ऋ० सा०
भा० ८ । ६५ । ८ ॥ (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] (ते इदं सोम्यं मधु)
तेरे लिये यह अमृतमय रस (नरः) नेता लोगों ने (अद्रिभिः) शिलबट्टानों द्वारा
(अधुक्षन्) दुहा है, (तत्) उसको (जुषाणः) प्रसन्न होकर (पिब) तू पी ॥
२—इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे । स पाहि मध्वो अन्धसः—अथ०
२० । १ । १, ऋ० ३ । ४० । १ ॥ (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ]
(त्वा वृषभम्) तुझ बलिष्ठ को (सुते) सिद्ध किये हुये (सोमे) ऐश्वर्य वा ओषधियों
के समूह में (वयं हवामहे) हम बुलाते हैं। (सः) सो तू (मध्वः) मधुर गुण वाले
(अन्धसः) अन्न की (पाहि) रक्षा कर ॥
३—मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये । जज्ञाना पूतदक्षसा—ऋ० १ । २३ ।
४ ॥ (वयम्) हम (जज्ञाना) विज्ञान कराने वाले, (पूतदक्षसा) पवित्र बल वाले
(मित्रम्) प्राण वायु (वरुणम्) और अपान वायु को (सोमपीतये) अमृत पीने के लिए
(हवामहे) बुलाते हैं ॥
४—मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः । स सुगोपातमो जनः—अथ०
२० । १ । २ । ऋ० १ । ८६ । १ और यजु० ८ । ३१ ॥ (विमहसः) हे विविध पूजनीय
(मरुतः) शूर विद्वानों ! (यस्य) जिस [राजा] के (क्षये) ऐश्वर्यं में (दिवः)
उत्तम व्यवहारों की (पाथ) तुम रक्षा करते हो, (सः हि) वह ही (सुगोपातमः)
अच्छे प्रकार पृथिवी का अत्यन्त पालने वाला (जनः) पुरुष है ॥
५—अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप । त्वष्टारं सोमपीतये—ऋ० १ ।
२२ । ९ । यजु० २६ । २० ॥ (अग्ने) हे विज्ञानी पुरुष ! (इह) यहाँ पर (देवानाम्)
विजय चाहने वाले वीरों की (उशतीः) कामना करती हुई (पत्नीः) पालन शक्तियों को
(त्वष्टारम्) सूक्ष्म करने वाले गुण को (सोमपीतये) अमृत पीने के लिए (उप आ
वह) तू ला ॥