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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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शित कर दिया है। मैंने भी पुराने भाष्य और अनुवाद के लिये बहुत खोज किया,
परन्तु कोई न मिला।
जब मेरा अथर्ववेद भाष्य हिन्दी अनुवाद सहित पूरा होकर संवत् १६७८
विक्रमीय (सन् १६२१ ईस्वी) में छपकर प्रकाशित हो गया, बहुत से विद्वान् महा-
शयों ने अनेक पुस्तकों के भाष्य करने की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया, उनमें
गोपथ के लिये बहु सम्मति थी, और मैंने विचार कर कि यह प्राचीन वैदिक ग्रन्थ
भी महान् उपयोगी है, इसीके लिये प्रयत्न किया। अपनी वृद्धावस्था के कारण मुझे
ग्रन्थ के पूरे हो जाने की आशा न थी, परन्तु सर्वशक्तिमान् परमात्मा की महती कृपा
से अब यह ग्रन्थ भाषानुवाद, टिप्पणियों, व्याकरण प्रक्रियाओं और विनियोगीय वेद
मन्त्रों आदि सहित सर्वसाधारण के सामने छपकर उपस्थित है। सब विचारशील स्त्री
पुरुष आत्मोन्नति करने और वेदार्थ जानने में उससे लाभ उठावें। संस्कृत कोषों में
वैदिक शब्द और ब्राह्मण शब्द बहुधा नहीं मिलते विद्वान् लोग इस ओर भी
ध्यान देवें॥
४—गोपथब्राह्मण का विषय॥
गोपथब्राह्मण अथर्ववेद का ब्राह्मण कहा जाता है, परन्तु उसमें यज्ञ करने के
लिये चारों वेदों के मन्त्रों का विनियोग है। इससे विदित है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद और अथर्ववेद चार वेद संहिताओं के अलग अलग नाम हैं और चारों नाम
एक दूसरे के भी बोधक हैं। और यह भी प्रकट है कि चारों वेदों का नाम अलग
अलग करके तथा मिलाकर त्रयी वा त्रयी विद्या [कर्म, उपासना और ज्ञान] है।
गोपथ पू० २।१८ में वर्णन है—(एष ह वै विद्वांत्सर्ववित् ब्रह्मा यद् भृग्वङ्गिरोवित्)
यही विद्वान् सब जानने वाला ब्रह्मा [प्रधान ऋत्विज्] है जो भृगु-अङ्गिराओं
[प्रकाशमान ज्ञानों, चारों वेदों] का जानने वाला पुरुष है। भगवान् यास्क मुनि
निरुक्त १।८ में लिखते हैं—(ब्रह्माणौ जाते जाते विद्यां वदति ब्रह्मा सर्वविद्यः सर्वं
वेदितुमर्हति, ब्रह्मा परिवृढः श्रुतः) एक ब्रह्मा उत्पन्न हुये हुये कर्म में विद्या बताता
है, ब्रह्मा सब विद्याओं वाला, और सब जानने योग्य होता है, ब्रह्मा वेदविद्या के
कारण बढ़ा हुआ होता है। यह भी प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा चतुर्मुखी अर्थात् चतुर्वेदी
होता है। इन कथनों से स्पष्ट है कि भृग्वङ्गिरस्, अथर्ववेद, ब्रह्मवेद आदि शब्द वेद
की संहिता विशेष [अथर्ववेद] के और चारों संहिताओं के नाम हैं, प्रकरण के अनु-
सार अर्थ कर लेना चाहिये॥
गोपथ में यज्ञ विषय [अर्थात् आहवनीय आदि अग्नियों द्वारा वेद मन्त्रों से
अग्नि प्रज्वलन] दीख पड़ता है, परन्तु वस्तुतः आत्मिक यज्ञ अर्थात् आत्मा की
उन्नति से पुरुषार्थ बढ़ाकर अन्न, प्रजा, पशु और स्वर्ग [सुख] की प्राप्ति का विधान
वेद मन्त्रों द्वारा वर्णित है। (या वाक् सोऽग्निः, यः प्राणः स वरुणः, यन्मनः स इन्द्रः,
यच्चक्षुः स बृहस्पतिः, यच्छ्रोत्रं स विष्णुः—गो० उ० ४।११) जो वाणी है वह अग्नि
[तापक पदार्थ] है, जो प्राण [श्वास] है, वह वरुण [स्वीकार करने योग्य पदार्थ]