गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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का राज्य और स्वर्ग अर्थात् सुख पाने के मार्ग का ईश्वरीय वा वैदिक ज्ञान । अर्थात्
इस ग्रन्थ के पढ़ने और विचारने से वेदों के पढ़ने, राज्य प्रबन्ध करने और परम
आनन्द पाने के लिये मनुष्य का पुरुषार्थ बढ़ता है ॥
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की वेदों की पठन पाठन
विधि, ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका प्रथमवार पृष्ठ ३२० में इस प्रकार लिखते हैं—
मनुष्य लोग वेदार्थ जा,ने के लिये अर्थयोजना सहित व्याकरण, अष्टा-
ध्यायी धातुपाठ उणादिगण गणपाठ और महाभाष्य शिक्षा, कल्प, निघण्टु
निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छः वेदों के अङ्ग । मीमांसा, वैशेषिक,
न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त, ये छः शास्त्र जो वेदों के उपाङ्ग, अर्थात्
जिनसे वेदार्थ ठीक ठीक जाना जाता है । तथा ऐतरेय, शतपथ, साम और
गोपथ, ये चार ब्राह्मण। इन सब ग्रन्थों को क्रम से पढ़के अथवा जिन्होंने उन
सम्पूर्ण ग्रन्थों को पढ़के जो सत्य सत्य वेद व्याख्यान किये हों उनको देखके
वेद का अर्थ यथावत् जान लेवें—इस लेख से प्रकट है कि वेदार्थ जिज्ञासुओं के
लिये चारों ब्राह्मण महान् उपयोगी हैं जिनमें से यह एक गोपथब्राह्मण है ॥
३—गोपथ के भाष्य करने में कठिनाई ॥
मेरे पास गोपथब्राह्मण की दो पुस्तकें हैं, एक पं० राजेन्द्रलाल मित्र सम्पादित,
छापा एशियाटिक सोसैटी कलकत्ता सन् १८७२ ईस्वी, दूसरा पं० जीवानन्द विद्या-
सागर सम्पादित छापा कलकत्ता सन् १८६१ ईस्वी । पं० राजेन्द्रलाल मित्र ने प्रयत्न
करके हस्तलिखित पुस्तकों को मिलाकर अपना पुस्तक पहिले ही पहिले छपवाया,
उसके पीछे पण्डित जीवानन्द का छपा । दोनों पुस्तकों में कुछ तो लेख प्रमाद और
कुछ छापे की अशुद्धियां हैं। इसके अतिरिक्त ग्रन्थ के प्रयोगों में प्रायः आर्ष शैली है—
जैसे ( इषे त्वा ) के स्थान पर ( इखे त्वा—पू० १ । २६ ), ( सरंसतायै ) के स्थान
पर (सरस्वतायै--उ० ४ । १८), ( पारुच्छेपी ) के स्थान पर (पारुक्षेपी-उ० ६ । १),
( कवीँरिच्छामि ) के स्थान पर ( कवीं ऋच्छामि-उ० ६ । २) इत्यादि इत्यादि ।
ऐसी अशुद्धियों और शैलियों के यथार्थ रूप वेद मन्त्रों और ऐतरेय ब्राह्मण से यथा-
सम्भव मैंने शुद्ध कर दिये हैं ॥
एक और कठिनाई है कि अब तक इस ब्राह्मण का न तो कोई भाष्य और
न कोई अनुवाद उपस्थित है राजेन्द्रलाल मित्र ने इसके भाष्य के लिए बहुत प्रयत्न
किया परन्तु न मिलने से इन्होंने मूल मात्र ही यथासम्भव शोधकर छपा दिया । पं०
राजेन्द्रलाल ने अपने गोपथब्राह्मण की भूमिका में और मौरिसब्लूम्सफील्ड साहिब ने
अपने पुस्तक ( The Atharva Veda and the Gopatha Brahmana by
Maurice Bloomsfield ) में अंगरेजी भाषा में कुछ टिप्पणियां दी हैं । वे किसी अंश
में उपयोगी हैं। उन महाशयों को धन्यवाद है जिन्होंने अपने अन्वेषण का फल प्रका-