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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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है कि वहां अनुवषट्कार ( एक वषट्कार के पश्चात् दूसरा वषट्कार ) भी किया जाता है
जो कि प्रधानाहुति का समर्थक एवं समाप्ति सूचक है ।
संवत्सर के अन्तर्गत छहों ऋतुओं के देवताओं के लिये ऋतुयाज के नाम से सोमरस
दिया जाता है । यतः इन ऋतुओं में प्राणी को सृष्टि के पूर्ण काल तक अन्न प्राप्त करना
अत्यन्त अपेक्षित है अतः ऋतुयाज में समाप्तिसूचक अनुवषट्कार नहीं होता क्योंकि ऋतुओं
को पूर्णता की सूचना देने पर उनके द्वारा प्राप्त होने वाली अन्नादिक वस्तुओं में भी समाप्ति
सम्भावित है अतः अनुवषट्कार न करने के कारण सोमरस का शेष भक्षण भी अन्न की
सर्वदा प्राप्ति की इच्छा के कारण नहीं होता, केवल ओष्ठ में सोमरस का लेपन करके
विधि पूर्ण मान लेते हैं इसीलिये कण्डिका में 'तथैव ह भवति लिम्पेदिति' कहा है ।
कण्डिका में 'स योऽत्र भक्षयेत्' ·········आदि वाक्यों का भाव है उस सोमरस का
शेष भक्षण जो करे उसे कहें कि बिना अनुवषट्कार किये हुए भक्ष को तुमने अपने शरीर
में प्राप्त कर लिया है अतः तुम नहीं जीवोगे अर्थात् उसका भक्षण करके अपने-आप को
पूर्णता प्राप्त कर लेने वाला मान लेने से याग में समृद्धि फल को नहीं प्राप्त कर सकोगे ।
यह यहाँ भाव है। इसी प्रकार गो. उ. १।६ का स्थल देखें, जिसकी पूर्वपीठिका इस प्रकार है—
शतपथ एवं अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों में देवताओं के दो भेद किये गये हैं । एक दिव्य देवता
तथा दूसरे मर्त्यलोक निवासी वेदज्ञ विद्वान् व्यक्ति । इन दोनों देवताओं की प्रसन्नता एवं
आशीर्वाद लाभ के लिये यज्ञ किया जाता है प्रस्तुत कण्डिका में स्पष्ट किया है कि देवताओं
के यज्ञीय भाग लेने की प्रक्रिया से अवान्तर दो भेद हैं। एक सोमपा दूसरे असोमपा देवता ।
दूसरे वर्ग में हुताद देवता एवं अहुताद देवता । द्वितीय वर्ग के अहुताद देवताओं में मनुष्य
लोकवासी विद्वानों की गणना है । ये मन्त्र द्रष्टा ब्राह्मण ऋषियों की देवानुग्रह प्राप्त सन्तान
है अतः उन ऋषियों के अनुग्रहकारी देवता से संबद्ध होने के कारण विभिन्न ऋषि विभिन्न
देवता स्वरूप हैं । इन ऋषियों और उनकी सन्तानों को मनुष्य देवता के रूप से यज्ञ में
अग्नि मुख से आहुति नहीं दी जाती है इसलिये इनको यज्ञीय दक्षिणाग्नि में पके हुए अन्वा-
हार्य नाम के चार व्यक्तियों के भोजन योग्य मात्र को दक्षिणा स्वरूप से देकर प्रसन्न किया
जाता है। इस प्रकार ये ब्राह्मण देवता अग्नि मुख में हवन के बिना यज्ञीय पाक को खाते
हैं अतः अहुताद है। जब इनको अन्वाहार्य संज्ञक यज्ञाग्नि सिद्धपाक को दक्षिणा स्वरूप से
दे दिया जाता है तो वे इस यजमान के घर में अपने आशीर्वाद से इषम् = अन्न ऊर्जम् =
बल को परिपूर्ण कर देते हैं किन्तु प्रथम ही इनको यज्ञीय पाक का भाग न देने पर यजमान
के इष एवं ऊर्ज को लेकर ये चले गये थे, और अब भी जा सकते हैं ।
स्थाली-पुलाक न्याय से हमने यहाँ दो स्थलों का याज्ञिक प्रक्रियानुसार अर्थ प्रदर्शित
किया है । ऐसे कतिपय स्थलों में टिप्पणी में भी हमने याज्ञिक भाव को स्पष्ट किया है किन्तु
ऐसा सर्वत्र नहीं किया जा सका क्योंकि उससे ग्रन्थ के कलेवर विस्तार का भय था । वैसे
गोपथ पर इस दृष्टिकोण से पृथक् कार्य की अपेक्षा है ताकि जिन परम्पराओं की सुरक्षार्थ
यह गोपथ है-उस पर पर्याप्त प्रकाश पड़ सके ।