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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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अशुद्ध शुद्ध
गो०पू० २।२१ जिघत्सुरतमः जिघत्सुतमः
,, ,, २।२१ अभिहुत्वा अभिहुत्य
,, ,, २।२१ अग्निः पदम् अग्निपदम्
,, ,, २।२१ ब्राह्मणम् ब्राह्मद्यम्
,, ,, ३।४ पं०१६ अशांसीन्ये३ (यहाँ यह पाठ अपपाठ. है क्योंकि शंसन होता का कर्म है)
,, ,, ३।४ ये ऽङ्गिरसः (इस पाठ की पुनरावृत्ति है)
गोपथ के मूल संस्करणों में इतने अधिक भ्रष्टपाठों का गोपथ की उपेक्षा के अतिरिक्त
एक और भी महत्त्वपूर्ण कारण ये है कि गोपथ ब्राह्मण का कोई भाष्य प्रस्तुत भाष्य के
अतिरिक्त नहीं उपलब्ध होता यदि श्री राजेन्द्रलाल मित्रादि को इसका भाष्य भी करना
होता तो पदे-पदे पाठों पर पूर्ण गहनता से विचार करना पड़ता। हमारे भाष्यकार के सामने
यह बहुत बड़ी कठिनता थी कि इससे पूर्व अर्थ की दृष्टि से पाठ शुद्धि पर विचार ही नहीं
किया गया, सर्व प्रथम उन्हें ही इस विषय में घोर परिश्रम करना पड़ा। प्रमाणाभाव में आर्ष-
प्रयोगः कहकर अशुद्धियों को उन्हें टालने की आवश्यकता पड़ी।
इस संस्करण में पाठशुद्धि के प्रति इतना सचेष्ट रहने पर भी यह कदापि नहीं कहा
जा सकता कि अब सर्वथा पाठ शुद्ध किये जा चुके हैं। भूलें अनेकों बाधाओं के कारण अब
भी रह गयी हैं जिनका हमें दुःख है तद्यथा--
(१) तत्सम्राज्यस्य सम्राट्त्वम् गो० पू० ५।१३ यह पाठ जर्मन एवं सभी संस्क-
रणों में ऐसा ही है किन्तु पं० चमूपति द्वारा सम्पादित वेदार्थ कोष में 'तत्सम्राजः सम्राट्-
त्वम्' गो० पू० ५।१३ पाठ है। इसके अनुसार हमने संशोधन किया किन्तु मुद्रण की
अनवधानता से पूर्ववत् वही पाठ रह गया। इसी प्रकार--
अशुद्ध शुद्ध अशुद्ध शुद्ध
पृ० पृ०
पुनन्त ११५ पुनन्तः रूपायामो १४५ रुपयामो
तिस्त्रो १४० तिस्रो शकृत् १४५ सकृत्
घ्याप्नोति ३३३ प्राप्नोति सपवेदम् २१ सर्पवेदम्
व्याहृतिर्गायत्रम् ३२ व्याहृति गायत्रम्
कण्डिका २।१० में तन्वमभि पर नं० २ की टिप्पणी का चिह्न छप गया है यह टिप्पणी
चिह्न कण्डिका की चौथी पंक्ति "वै" पर जानी चाहिये।
मेरा निश्चित विचार है कि ब्राह्मण-ग्रन्थों का अध्ययन अध्यापन करते हुये किसी को भी
श्रौत क्रियाओं एवं उसमें वर्णित यज्ञ यागादि का सामान्य परिचय अवश्य होना चाहिये इसका
ज्ञान न होने से अर्थ एवं पाठ में भ्रान्ति सुनिश्चित है। प्रस्तुत भाष्य में ऐसे स्थल बहुत
हैं जहाँ तद्वर्णित याज्ञिक प्रक्रिया का संकेत न करके शाब्दिक अर्थ मात्र से काम चलाया
गया है। तद्यथा- गो० उ.३।८ को देखें। यहाँ सोम याग की एक प्रक्रिया का रहस्योद्घाटित
है। इसके ज्ञान के लिये याज्ञिक प्रक्रिया की पूर्वपीठिका का ज्ञान होना चाहिये वह इस
प्रकार है-सभी श्रौतयज्ञों में वषट्कार से आहुति देते हैं किन्तु सोमयाग में विशेषता यह