गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० २३ ॥ १२७
धारण शक्ति वा अन्न वा अमृत ] और स्वर्ग लोग को सेया है । (ब्राह्मणाः ऋषयः तेन
अन्ततः सुन्वन्ति) ब्रह्म ज्ञानी ऋषि लोग उस [ कर्म ] से अन्त में [ सोम रस ] निचोड़ते
हैं । (स्त्रियः केवले आत्मनि अवारुन्धत) स्त्रियों ने सेवनीय परमात्मा में [ स्वर्ग
आदि ] पाया है । (वाह्याः उभयेन सुन्वन्ति, ले चलने योग्य पुरुष दोनों [ ब्राह्म्य
ओर प्राजापत्य हवि] से [सोम रस] निचोड़ते हैं । (यत् वै यज्ञे ब्राह्म्य हविः न निरूप्येत
प्राजापत्यहविषः मनुष्या अनृजवः जायेरन्) जो यज्ञ में ब्राह्म्य हवि न बनाया जावे,
प्राजापत्य हवि वाले मनुष्य कुटिल हो जावें । (असौ हि एषः पिता यान् लोकान्
शृण्विति) वह पिता [ पालन करने वाला पुरुष ] भी [ उन बुरे लोगों में कुटिल होता है ]
जिन लोगों को वह सुनता है, (आहवनीयस्य गार्हपत्यस्य दक्षिणाग्नेः यः अग्निहोत्रं
जुहोति इति) [वह पुरुष भी कुटिल होता है] जो आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि के
अग्निहोत्र को ही करता है। (देवाः प्रिये धामनि मदन्ति तेषाम् एषः अग्निः सान्तपन-
श्रेष्ठः भवति) देव [ विद्वान् लोग ] प्रिय स्थान में सुख पाते हैं, उनका यह अग्नि सान्तपन
[ पूरे ऐश्वर्य वाला ] श्रेष्ठ होता है । (एतस्य वाचि तृप्तायाम् अग्निः तृप्यति) इस
[ ब्रह्मा ] की वाणी तृप्त होने पर अग्नि तृप्त होता है, (प्राणे तृप्ते वायुः तृप्यति)
प्राण तृप्त होने पर पवन तृप्त होता है, (चक्षुषि तृप्ते आदित्यः तृप्यति) नेत्र तृप्त होने
पर सूर्य तृप्त होता है, (मनसि तृप्ते चन्द्रमाः तृप्यति) मन तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त
होता है, (श्रोत्रे तृप्ते दिशः च अन्तर्देशाः च तृप्यन्ति) कान तृप्त होने पर दिशायें
और बीच की दिशायें तृप्त होती हैं । (स्नेहेषु तृप्तेषु आपः तृप्यन्ति) रसों वा चिकने
पदार्थों के तृप्त होने पर जल तृप्त होते हैं, (लोमेषु तृप्तेषु ओषधिवनस्पतयः तृप्यन्ति)
लोमों के तृप्त होने पर ओषधि और वनस्पतियां तृप्त होती हैं, (शरीरे तृप्ते पृथिवी
तृप्यति) शरीर तृप्त होने पर पृथिवी तृप्त होती है । (एवं एषः सान्तपनः श्रेष्ठः तृप्तः
सर्वान् तृप्तान् तर्पयति इति ब्राह्मणम्) इस प्रकार से यह श्रेष्ठ तृप्त सान्तपन [ बड़े
ऐश्वर्य वाला ] अग्नि सब तृप्त [ पदार्थों ] को तृप्त करता है, यह ब्राह्मण है । २२ ॥
भावार्थः- मनुष्य सान्तपन अग्नि में ब्राह्म्य हवि और प्राजापत्य हवि छोड़ें।
प्राजापत्य और स्त्री आदि शब्दों से शास्त्र रीति पर सन्तानोत्पादन की ओर संकेत जान
पड़ता है । इस विषय के लिये देखो—बृहदारण्यकोपनिषद्, अध्याय ६ ब्राह्मण ५ ॥
कण्डिका २३ ॥
सान्तपना इदं हविरित्येष ह वै सान्तपनोऽग्निर्यद् ब्राह्मणो यस्य गर्भा-
धारणपोषणयोः-कः, टाप् । अथवा क्विप् । स्वधा = उदकम्—निघ० १ । १२ । अन्नम्
निघ० २ । ७ । पितॄणाम् अन्नम् । अमृतम् । आत्मधारणसामर्थ्यम् (सुन्वन्ति)
सोमरसम् निष्पीडयन्ति (केवले) केवृ सेवने—कलच् । सेवनीये । निश्चिते ।
(आत्मनि) परमात्मनि (वाह्या ) वह प्रापणे ण्यत् । प्रापणीयाः पुरुषाः
(उभयेन) ब्राह्म्येन प्राजापत्येन च हविषा (शृण्विति) आर्षप्रयोगः ।
शृणोति । (धामनि) स्थाने (मदन्ति) हर्षन्ति (स्नेहेषु) रसयुक्तपदार्थेषु ॥