गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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पद-सूचना पृष्ठ-संख्या पद-सूचना पृष्ठ-संख्या
सखि ! रघुवीर मुखछबि सुनु खल ! मैं तोहि बहुत .... ५५७
देखु .... ३९७ सुनि हनुमंत बचन रघुबीर ... ३६२
साँचेहु बिभीषन आइहै ! .... ३३२ सुनि रन घायल .... ३६७
साँझ समय रघुबीर पुरी की.... ४२० सुनियत सागरसेतु बंधायो .... ३७५
सादर सुमुखि बिलोकि .... ७५ सुमिरत श्रीरघुबीरकी बाँहैं.... ४०२
सानुज भरत भवन उठि धाए १६२ सुनि ब्याकुल भए .... ४३४
सिरिस-सुमन सुकुमारि .... २०७ सुभ दिन सुभ घरी .... ४३८
सिय ! धीरज धरिये .... ३५० सोइये लाल लाड़िले
सीय ! स्वयंबरु, माई ... १२६ रघुराई .... ५२
सुभग सेज सोभित कौसिल्या ३६ सोहत सहज सुहाये नैन .... ७७
सुखनींद कहति आलि आइहौं ५४ सोहत मग मुनि संग .... ६८
सुनु सखि भूपति .... १२६ सोचत जनक पोंच पेच .... १३९
सुजन सराहँ जो .... १४१ सोहैं साँवरे पथिक .... १६४
सुनो भैया भूप सकल .... १४४ सो दिन सोनेको .... ३३६
सुनहु राम मेरे प्रानपियारे ... १७५ हाथ मीजिबो हाथ रह्यो .... २५२
सुन्यो जब फिरि सुमंत .... २३७ हिय बिहसि कहत .... ३३१
सुकसों गहबर हिये .... २४६ हृदय घाउ मेरे .... ३६९
सुनी मैं, सखि मंगल .... २६६ हेमको हरिन हनि .... २७५
सुभग सरासन सायक जोरें .... २६८ ह्वै हौ लाल कबँहि बड़े .... ४०
सुमन समीरको धीर धुरीन.... २९६ हो तो नहि जी जग .... ३६६
सुनहु राम विश्रामधाम .... ३३२ हौं तो समुझि रही .... २६३
सुजन सुनि श्रवन .... ३४१ हौं रघुबंसमनि को दूत .... २६८
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