गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
About this granth
Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.
The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.
Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.
६५६ * गीता-संग्रह *
तीसरा अध्याय
कुररसे लेकर भृंगीतक सात गुरुओंकी कथा
ब्राह्मण उवाच
परिग्रहो हि दुःखाय यद् यत्प्रियतमं नृणाम्।
अनन्तं सुखमाप्नोति तद् विद्वान् यस्त्वकिञ्चनः ॥ १॥
अवधूत दत्तात्रेयजीने कहा—राजन्! मनुष्योंको जो वस्तुएँ अत्यन्त प्रिय लगती हैं, उन्हें इकट्ठा करना ही उनके दुःखका कारण है। जो बुद्धिमान् पुरुष यह बात समझकर अकिंचनभावसे रहता है—शरीरकी तो बात ही अलग, मनसे भी किसी वस्तुका संग्रह नहीं करता—उसे अनन्त सुखस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति होती है॥ १॥
सामिषं कुररं जघ्नुर्बलिनो ये निरामिषाः।
तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत ॥ २ ॥
एक कुरर (क्रौंच) पक्षी अपनी चोंचमें मांसका टुकड़ा लिये हुए था। उस समय दूसरे बलवान् पक्षी, जिनके पास मांस नहीं था, उससे छीननेके लिये उसे घेरकर चोंचें मारने लगे। जब कुरर पक्षीने अपनी चोंचसे मांसका टुकड़ा फेंक दिया, तभी उसे सुख मिला॥ २॥
न मे मानावमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिणाम्।
आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत् ॥ ३ ॥
मुझे मान या अपमानका कोई ध्यान नहीं है और घर एवं परिवारवालोंको जो चिन्ता होती है, वह मुझे नहीं है। मैं अपने आत्मामें ही रमता हूँ और अपने साथ ही क्रीडा करता हूँ। यह शिक्षा मैंने बालकसे ली है। अतः उसीके समान मैं भी मौजसे रहता हूँ॥ ३॥
- अवधूतगीता (२) * ६५७
द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ।
यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः ॥ ४ ॥
इस जगत्में दो ही प्रकारके व्यक्ति निश्चिन्त और परमानन्दमें मग्न रहते हैं—एक पुरुष तो भोला-भाला निश्चेष्ट नन्हा-सा बालक और दूसरा वह पुरुष जो गुणातीत हो गया हो॥ ४॥
क्वचित् कुमारी त्वात्मानं वृणानान् गृहमागतान्।
स्वयं तानर्हयमास क्वापि यातेषु बन्धुषु ॥ ५ ॥
एक बार किसी कुमारी कन्याके घर उसे वरण करनेके लिये कई लोग आये हुए थे। उस दिन उसके घरके लोग कहीं बाहर गये हुए थे। इसलिये उसने स्वयं ही उनका आतिथ्य-सत्कार किया॥ ५॥
तेषामभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव।
अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्चक्रुः शङ्खाः स्वनं महत् ॥ ६ ॥
राजन्! उनको भोजन करानेके लिये वह घरके भीतर एकान्तमें धान कूटने लगी। उस समय उसकी कलाईमें पड़ी शंखकी चूड़ियाँ जोर-जोरसे बज रही थीं॥ ६॥
सा तज्जुगुप्सितं मत्वा महती व्रीडिता ततः।
बभञ्जैकैकशः शङ्खान् द्वौ द्वौ पाण्योरशेषयत् ॥ ७ ॥
इस शब्दको निन्दित समझकर कुमारीको बड़ी लज्जा मालूम हुई* और उसने एक-एक करके सब चूड़ियाँ तोड़ डालीं और दोनों हाथोंमें केवल दो-दो चूड़ियाँ रहने दीं॥ ७॥
उभयोरप्यभूद् घोषो ह्यवघ्नन्त्याः स्म शङ्खयोः।
तत्राप्येकं निरभिददेकस्मान्नाभवद् ध्वनिः ॥ ८ ॥
अब वह फिर धान कूटने लगी। परन्तु वे दो-दो चूड़ियाँ भी
* क्योंकि उससे उसका स्वयं धान कूटना सूचित होता था, जो कि उसकी दरिद्रताका द्योतक था।
६५८ * गीता-संग्रह *
बजने लगीं, तब उसने एक-एक चूड़ी और तोड़ दी। जब दोनों कलाइयोंमें केवल एक-एक चूड़ी रह गयी, तब किसी प्रकारकी आवाज नहीं हुई॥८॥
अन्वशिक्षमिमं तस्या उपदेशमरिन्दम।
लोकाननुचरन्नेताँल्लोकतत्त्वविवित्सया ॥ ९ ॥
वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि।
एक एव चरेत्तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः॥ १०॥
रिपुदमन! उस समय लोगोंका आचार-विचार निरखने-परखनेके लिये इधर-उधर घूमता-घामता मैं भी वहाँ पहुँच गया था। मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि जब बहुत लोग एक साथ रहते हैं तब कलह होता है और दो आदमी साथ रहते हैं तब भी बातचीत तो होती ही है; इसलिये कुमारी कन्याकी चूड़ीके समान अकेले ही विचरना चाहिये॥ ९-१०॥
मन एकत्र संयुञ्ज्याज्जितश्वासो जितासनः।
वैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रितः॥११॥
राजन्! मैंने बाण बनानेवालेसे यह सीखा है कि आसन और श्वासको जीतकर वैराग्य और अभ्यासके द्वारा अपने मनको वशमें कर ले और फिर बड़ी सावधानीके साथ उसे एक लक्ष्यमें लगा दे॥११॥
यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत-
च्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून्।
सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च
विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम् ॥ १२ ॥
जब परमानन्दस्वरूप परमात्मामें मन स्थिर हो जाता है, तब वह धीरे-धीरे कर्मवासनाओंकी धूलको धो बहाता है। सत्त्वगुणकी
कुमारीद्वारा दोनों हाथोंकी एक-एक चूड़ी छोड़कर शेष तोड़नेसे आवाज बन्द
तन्मयताके कारण बाण बनानेवालेको राजाकी सवारीका भान न होना
६६० * गीता-संग्रह *
वृद्धिसे रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंका त्याग करके मन वैसे ही शान्त हो जाता है, जैसे ईंधनके बिना अग्नि ॥ १२ ॥
तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो
न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा।
यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्त-
मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे ॥ १३ ॥
इस प्रकार जिसका चित्त अपने आत्मामें ही स्थिर—निरुद्ध हो जाता है, उसे बाहर-भीतर कहीं किसी पदार्थका भान नहीं होता। मैंने देखा था कि एक बाण बनानेवाला कारीगर बाण बनानेमें इतना तन्मय हो रहा था कि उसके पाससे ही दलबलके साथ राजाकी सवारी निकल गयी और उसे पतातक न चला ॥ १३ ॥
एकचार्यनिकेतः स्यादप्रमत्तो गुहाशयः।
अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरेकोऽल्पभाषणः ॥ १४ ॥
राजन् ! मैंने साँपसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संन्यासीको सर्पकी भाँति अकेले ही विचरण करना चाहिये, उसे मण्डली नहीं बाँधनी चाहिये, मठ तो बनाना ही नहीं चाहिये। वह एक स्थानमें न रहे, प्रमाद न करे, गुहा आदिमें पड़ा रहे, बाहरी आचारोंसे पहचाना न जाय। किसीसे सहायता न ले और बहुत कम बोले ॥ १४ ॥
गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलश्चाध्रुवात्मनः।
सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥ १५ ॥
इस अनित्य शरीरके लिये घर बनानेके बखेड़ेमें पड़ना व्यर्थ और दुःखकी जड़ है। साँप दूसरेके बनाये घरमें घुसकर बड़े आरामसे अपना समय काटता है ॥ १५ ॥
एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया।
संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥
* अवधूतगीता ( २ ) * ६६१
एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः ।
कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु ।
सत्त्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपुरुषेश्वरः ॥ १७ ॥
परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः ।
केवलानुभवानन्दसन्दोहो निरुपाधिकः ॥ १८ ॥
केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम् ।
संक्षोभयन् सृजत्यादौ तया सूत्रमरिन्दम ॥ १९ ॥
तामाहुस्त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम् ।
यस्मिन् प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पुमान् ॥ २० ॥
अब मकड़ीसे ली हुई शिक्षा सुनो। सबके प्रकाशक और अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान् भगवान्ने पूर्वकल्पमें बिना किसी अन्य सहायकके अपनी ही मायासे रचे हुए जगत्को कल्पके अन्तमें (प्रलयकाल उपस्थित होनेपर) कालशक्तिके द्वारा नष्ट कर दिया—उसे अपनेमें लीन कर लिया और सजातीय, विजातीय तथा स्वगतभेदसे शून्य अकेले ही शेष रह गये। वे सबके अधिष्ठान हैं, सबके आश्रय हैं, परन्तु स्वयं अपने आश्रय—अपने ही आधारसे रहते हैं, उनका कोई दूसरा आधार नहीं है। वे प्रकृति और पुरुष दोनोंके नियामक, कार्य और कारणात्मक जगत्के आदिकारण परमात्मा अपनी शक्ति कालके प्रभावसे सत्त्व-रज आदि समस्त शक्तियोंको साम्यावस्थामें पहुँचा देते हैं और स्वयं कैवल्यरूपसे एक और अद्वितीयरूपसे विराजमान रहते हैं। वे केवल अनुभवस्वरूप और आनन्दघनमात्र हैं। किसी भी प्रकारकी उपाधिका उनसे सम्बन्ध नहीं है। वे ही प्रभु केवल अपनी शक्ति कालके द्वारा अपनी त्रिगुणमयी मायाको क्षुब्ध करते हैं और उससे पहले क्रियाशक्ति-प्रधान सूत्र (महत्तत्त्व) की रचना करते हैं। यह सूत्ररूप महत्तत्त्व ही
६६२ * गीता-संग्रह *
तीनों गुणोंकी पहली अभिव्यक्ति है, वही सब प्रकारकी सृष्टिका मूल कारण है। उसीमें यह सारा विश्व, सूतमें ताने-बानेकी तरह ओतप्रोत है और इसीके कारण जीवको जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ना पड़ता है॥ १६-२०॥
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्रतः।
तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वरः॥ २१॥
जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुँहके द्वारा जाला फैलाती है, उसीमें विहार करती है और फिर उसे निगल जाती है, वैसे ही परमेश्वर भी इस जगत्को अपनेमेंसे उत्पन्न करते हैं, उसमें जीवरूपसे विहार करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं॥ २१॥
यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया।
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् वापि याति तत्तत्स्वरूपताम्॥ २२॥
राजन्! मैंने भृंगी (बिलनी) कीड़ेसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि यदि प्राणी स्नेहसे, द्वेषसे अथवा भयसे भी जान-बूझकर एकाग्ररूपसे अपना मन किसीमें लगा दे तो उसे उसी वस्तुका स्वरूप प्राप्त हो जाता है॥ २२॥
कीटः पेशस्कृतं ध्यायन् कुड्यां तेन प्रवेशितः।
याति तत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसन्त्यजन्॥ २३॥
राजन्! जैसे भृंगी एक कीड़ेको ले जाकर दीवारपर अपने रहनेकी जगह बन्द कर देता है और वह कीड़ा भयसे उसीका चिन्तन करते-करते अपने पहले शरीरका त्याग किये बिना ही उसी शरीरसे तद्रूप हो जाता है^*॥ २३॥
^* जब उसी शरीरसे चिन्तन किये रूपकी प्राप्ति हो जाती है, तब दूसरे शरीरसे तो कहना ही क्या है? इसीलिये मनुष्यको अन्य वस्तुका चिन्तन न करके केवल परमात्माका ही चिन्तन करना चाहिये।
- अवधूतगीता (२) * ६६३
एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिता मतिः।
स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धिं शृणु मे वदतः प्रभो॥ २४॥
राजन्! इस प्रकार मैंने इतने गुरुओंसे ये शिक्षाएँ ग्रहण कीं। अब मैंने अपने शरीरसे जो कुछ सीखा है, वह तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो॥ २४॥
देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु-
र्बिभ्रत् स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्युदर्कम्।
तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि
पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्गः॥ २५॥
यह शरीर भी मेरा गुरु ही है; क्योंकि यह मुझे विवेक और वैराग्यकी शिक्षा देता है। मरना और जीना तो इसके साथ लगा ही रहता है। इस शरीरको पकड़ रखनेका फल यह है कि दुःख-पर-दुःख भोगते जाओ। यद्यपि इस शरीरसे तत्त्वविचार करनेमें सहायता मिलती है, तथापि मैं इसे अपना कभी नहीं समझता; सर्वदा यही निश्चय रखता हूँ कि एक दिन इसे सियार-कुत्ते खा जायँगे। इसीलिये मैं इससे असंग होकर विचरता हूँ॥ २५॥
जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान्
पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षुतया वितन्वन्।
स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः
सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा॥ २६॥
जीव जिस शरीरका प्रिय करनेके लिये ही अनेकों प्रकारकी कामनाएँ और कर्म करता है तथा स्त्री-पुत्र, धन-दौलत, हाथी-घोड़े, नौकर-चाकर, घर-द्वार और भाई-बन्धुओंका विस्तार करते हुए उनके पालन-पोषणमें लगा रहता है। बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ सहकर धनसंचय करता है। आयुष्य पूरी होनेपर वही शरीर स्वयं तो नष्ट होता ही
६६४ * गीता-संग्रह *
है, वृक्षके समान दूसरे शरीरके लिये बीज बोकर उसके लिये भी दुःखकी व्यवस्था कर जाता है॥२६॥
जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा
शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित्।
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति-
र्बह्व्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति॥२७॥
जैसे बहुत-सी सौतें अपने एक पतिको अपनी-अपनी ओर खींचती हैं, वैसे ही जीवको जीभ एक ओर—स्वादिष्ट पदार्थोंकी ओर खींचती है तो प्यास दूसरी ओर—जलकी ओर; जननेन्द्रिय एक ओर—स्त्रीसंभोगकी ओर ले जाना चाहती है तो त्वचा, पेट और कान दूसरी ओर—कोमल स्पर्श, भोजन और मधुर शब्दकी ओर खींचने लगते हैं। नाक कहीं सुन्दर गन्ध सूँघनेके लिये ले जाना चाहती है तो चंचल नेत्र कहीं दूसरी ओर सुन्दर रूप देखनेके लिये। इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ दोनों ही इसे सताती रहती हैं॥२७॥
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्त्या
वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्।
तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय
ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः॥२८॥
वैसे तो भगवान्ने अपनी अचिन्त्य शक्ति मायासे वृक्ष, सरीसृप (रेंगनेवाले जन्तु), पशु, पक्षी, डाँस और मछली आदि अनेकों प्रकारकी योनियाँ रचीं; परन्तु उनसे उन्हें सन्तोष न हुआ। तब उन्होंने मनुष्यशरीरकी सृष्टि की। यह ऐसी बुद्धिसे युक्त है, जो ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकती है। इसकी रचना करके वे बहुत आनन्दित हुए॥२८॥
- अवधूतगीता ( २ ) * ६६५
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-
न्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥ २९ ॥
यद्यपि यह मनुष्य-शरीर है तो अनित्य ही—मृत्यु सदा इसके पीछे लगी रहती है। परन्तु इससे परमपुरुषार्थकी प्राप्ति हो सकती है; इसलिये अनेक जन्मोंके बाद यह अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि शीघ्र-से-शीघ्र, मृत्युके पहले ही मोक्ष-प्राप्तिका प्रयत्न कर ले। इस जीवनका मुख्य उद्देश्य मोक्ष ही है। विषयभोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें यह अमूल्य जीवन नहीं खोना चाहिये॥ २९ ॥
एवं सञ्जातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि।
विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहङ्कृतिः ॥ ३० ॥
राजन्! यही सब सोच-विचारकर मुझे जगत्से वैराग्य हो गया। मेरे हृदयमें ज्ञान-विज्ञानकी ज्योति जगमगाती रहती है। न तो कहीं मेरी आसक्ति है और न कहीं अहंकार ही। अब मैं स्वच्छन्दरूपसे इस पृथ्वीमें विचरण करता हूँ ॥ ३० ॥
न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम्।
ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः ॥ ३१ ॥
राजन्! अकेले गुरुसे ही यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता, उसके लिये अपनी बुद्धिसे भी बहुत-कुछ सोचने-समझनेकी आवश्यकता है। देखो! ऋषियोंने एक ही अद्वितीय ब्रह्मका अनेकों प्रकारसे गान किया है। (यदि तुम स्वयं विचारकर निर्णय न करोगे, तो ब्रह्मके वास्तविक स्वरूपको कैसे जान सकोगे?) ॥ ३१ ॥
२५- जीवन्मुक्तगीता (भगवान दत्तात्रेय)
६६६ * गीता-संग्रह *
श्रीभगवानुवाच
इत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्र्य गभीरधीः।
वन्दितोऽभ्यर्थितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम्॥ ३२॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्यारे उद्धव! गम्भीर-बुद्धि अवधूत दत्तात्रेयने राजा यदुको इस प्रकार उपदेश किया। यदुने उनकी पूजा और वन्दना की, दत्तात्रेयजी उनसे अनुमति लेकर बड़ी प्रसन्नतासे इच्छानुसार पधार गये॥ ३२॥
अवधूतवचः श्रुत्वा पूर्वेषां नः स पूर्वजः।
सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः समचित्तो बभूव ह॥ ३३॥
हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज राजा यदु अवधूत दत्तात्रेयकी यह बात सुनकर समस्त आसक्तियोंसे छुटकारा पा गये और समदर्शी हो गये। (इसी प्रकार तुम्हें भी समस्त आसक्तियोंका परित्याग करके समदर्शी हो जाना चाहिये)॥ ३३॥
॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे
अवधूतगीतायां तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
॥ अवधूतगीता सम्पूर्णा ॥
जीवन्मुक्तगीता
[ वेदान्तसारसे ओत-प्रोत अत्यन्त लघुकलेवरवाली जीवन्मुक्तगीता श्रीदत्तात्रेयजीकी रचना है, जिसमें अत्यन्त संक्षिप्त, पर सारगर्भित ढंगसे सहज-सुबोध दृष्टान्तोंद्वारा जीव तथा ब्रह्मके एकत्वका प्रतिपादन किया गया है, साथ ही जीवन्मुक्त-अवस्थाको भी सम्यक् रूपसे परिभाषित किया गया है। इसी साधकोपयोगी गीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
जीवन्मुक्तिश्च या मुक्तिः सा मुक्तिः पिण्डपातने।
या मुक्तिः पिण्डपातेन सा मुक्तिः शुनि शूकरे॥ १॥
अपने शरीरकी आसक्तिका त्याग (देहबुद्धिका त्याग) ही वस्तुतः जीवन्मुक्ति है। शरीरके नाश होनेपर शरीरसे जो मुक्ति (मृत्यु) होती है, वह तो कूकर-शूकर आदि समस्त प्राणियोंको भी प्राप्त ही है॥ १॥
जीवः शिवः सर्वमेव भूतेष्वेवं व्यवस्थितः।
एवमेवाभिपश्यन् हि जीवन्मुक्तः स उच्यते॥ २॥
शिव (परमात्मा) ही सभी प्राणियोंमें जीवरूपसे विराजमान हैं—इस प्रकार देखनेवाला अर्थात् सर्वत्र भगवद्दर्शन करनेवाला मनुष्य ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥ २॥
एवं ब्रह्म जगत्सर्वमखिलं भासते रविः।
संस्थितं सर्वभूतानां जीवन्मुक्तः स उच्यते॥ ३॥
जिस प्रकार सूर्य समस्त ब्रह्माण्डमण्डलको प्रकाशित करता रहता है, उसी प्रकार चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म समस्त प्राणियोंमें प्रकाशित होकर सर्वत्र व्याप्त है। इस ज्ञानसे परिपूर्ण मनुष्य ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥ ३॥
६६८ * गीता-संग्रह *
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्।
आत्मज्ञानी तथैवैको जीवन्मुक्तः स उच्यते॥४॥
जैसे एक ही चन्द्रमा अनेक जलाशयोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेक रूपोंमें दिखायी देता है, उसी प्रकार यह अद्वितीय आत्मा अनेक देहोंमें भिन्न-भिन्न रूपसे दीखनेपर भी एक ही है—इस आत्मज्ञानको प्राप्त मनुष्य ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥४॥
सर्वभूते स्थितं ब्रह्म भेदाभेदो न विद्यते।
एकमेवाभिपश्यँश्च जीवन्मुक्तः स उच्यते॥५॥
सभी प्राणियों में स्थित ब्रह्म (परमात्मा) भेद और अभेदसे परे है। (एक होनेके कारण भेदसे परे और अनेक रूपोंमें दीखनेके कारण अभेदसे परे है) इस प्रकार अद्वितीय परमतत्त्वको सर्वत्र व्याप्त देखनेवाला मनुष्य ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥५॥
तत्त्वं क्षेत्रं व्योमातीतमहं क्षेत्रज्ञ उच्यते।
अहं कर्ता च भोक्ता च जीवन्मुक्तः स उच्यते॥६॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन पंचतत्त्वोंसे बना यह शरीर ही क्षेत्र है तथा आकाशसे परे अहंकार ('मैं') ही क्षेत्रज्ञ (शरीररूपी क्षेत्रको जाननेवाला) कहा जाता है। यह 'मैं' (अहंकार) ही समस्त कर्मोंका कर्ता और कर्मफलोंका भोक्ता है। (चिदानन्दस्वरूप आत्मा नहीं)—इस ज्ञानको धारण करनेवाला ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥६॥
कर्मेन्द्रियपरित्यागी ध्यानावर्जितचेतसः।
आत्मज्ञानी तथैवैको जीवन्मुक्तः स उच्यते॥७॥
ध्यानसे भरे एकाग्र चित्तवाला और कर्मेन्द्रियोंकी हलचलसे रहित, अद्वितीय आत्मतत्त्वमें लीन ज्ञानी ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥७॥
- जीवन्मुक्तगीता * ६६९
शारीरं केवलं कर्म शोकमोहादिवर्जितम्।
शुभाशुभपरित्यागी जीवन्मुक्तः स उच्यते॥८॥
जो मनुष्य शोक और मोहसे रहित होकर यथाप्राप्त शरीरधर्मका पालन करता हुआ कर्म करता रहता है और शुभ-अशुभके भेदसे ऊपर उठ गया है, ऐसा ज्ञानी ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥८॥
कर्म सर्वत्र आदिष्टं न जानाति च किञ्चन।
कर्म ब्रह्म विजानाति जीवन्मुक्तः स उच्यते॥९॥
शास्त्रविहित कर्मके अतिरिक्त जो अन्य कुछ नहीं जानता तथा कर्मको ब्रह्मस्वरूप जानता हुआ सम्पादित करता रहता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥९॥
चिन्मयं व्यापितं सर्वमाकाशं जगदीश्वरम्।
सहितं सर्वभूतानां जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१०॥
सभी प्राणियोंके हृदयाकाशमें व्याप्त चिन्मय परमात्मतत्त्वको जो जानता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१०॥
अनादिवर्ती भूतानां जीवः शिवो न हन्यते।
निर्वैरः सर्वभूतेषु जीवन्मुक्तः स उच्यते॥११॥
प्राणियोंमें स्थित शिवस्वरूप जीवात्मा अनादि है और इसका नाश नहीं हो सकता—ऐसा जानकर जो सभी प्राणियोंके प्रति वैर-रहित हो जाता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥११॥
आत्मा गुरुस्त्वं विश्वं च चिदाकाशो न लिप्यते।
गतागतं द्वयोर्नास्ति जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१२॥
आत्मा ही गुरुरूप और विश्वरूप है, इस चैतन्य आकाशको कुछ भी मलिन नहीं कर सकता। भूतकाल और वर्तमान दोनोंही कालके
६७० * गीता-संग्रह *
अंश होनेसे एक ही हैं, दो नहीं, जो ऐसा जानता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१२॥
गर्भध्यानेन पश्यन्ति ज्ञानिनां मन उच्यते।
सोऽहं मनो विलीयन्ते जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१३॥
अन्तःध्यानके द्वारा जिसे ज्ञानीजन देख पाते हैं, वह 'मन' कहा जाता है। उस मनको सोऽहं (वह परमतत्त्व मैं ही हूँ)-की भावनामें जो विलीन कर लेता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१३॥
ऊर्ध्वध्यानेन पश्यन्ति विज्ञानं मन उच्यते।
शून्यं लयं च विलयं जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१४॥
उच्चध्यानमें स्थित होकर जिस चैतन्यका दर्शन योगीजन करते हैं, वह 'मन' कहा जाता है। उस मनको शून्य, लय तथा विलयकी प्रक्रियासे जो युक्त कर लेता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१४॥
अभ्यासे रमते नित्यं मनो ध्यानलयङ्गतम्।
बन्धमोक्षद्वयं नास्ति जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१५॥
मनको ध्यानसे लय करके जो नित्य अभ्यासमें लगा रहता है और जिसे यह ज्ञान हो गया है कि बन्धन और मोक्ष दोनोंकी ही सत्ता वास्तविक नहीं है (मायिक है), वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१५॥
एकाकी रमते नित्यं स्वभावगुणवर्जितम्।
ब्रह्मज्ञानरसास्वादी जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१६॥
स्वभावसिद्ध गुणोंसे रहित होकर (ऊपर उठकर) जो एकान्तमें मग्न रहता है, वह ब्रह्मज्ञानके रसका आनन्द लेनेवाला ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१६॥
* जीवनमुक्तगीता * ६७१
हृदि ध्यानेन पश्यन्ति प्रकाशं क्रियते मनः।
सोऽहं हंसेति पश्यन्ति जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१७॥
जो साधक अपने हृदयमें उस परमतत्त्वका 'सोऽहं—हंसः' रूपसे ध्यानकरते हैं तथा अपने चित्तको उससे प्रकाशित करते हैं, वे जीवन्मुक्त कहे जाते हैं॥१७॥
शिवशक्तिसमात्मानं पिण्डब्रह्माण्डमेव च।
चिदाकाशं हृदं मोहं जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१८॥
अपनी आत्माको शिव-शक्तिरूप परमात्मतत्त्व जानकर और अपने शरीर तथा ब्रह्माण्डको समान जानता हुआ जो हृदयस्थित मोहको चिदाकाशमें विलीन कर देता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१८॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिञ्च तुरीयावस्थितं सदा।
सोऽहं मनो विलीयेत जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१९॥
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीयावस्थामें रहते हुए भी जिसका मन सदा सोऽहं (मैं वही परमात्मतत्त्व हूँ)-के भावमें मग्न रहता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१९॥
सोऽहं स्थितं ज्ञानमिदं सूत्रेषु मणिवत्परम्।
सोऽहं ब्रह्म निराकारं जीवन्मुक्तः स उच्यते॥२०॥
मैं वही निराकार ब्रह्म हूँ—इस सोऽहं ज्ञानधारामें जो उसी प्रकार निरन्तर स्थित रहता है, जैसे पिरोयी गयी मणिमालामें सूत्र निरन्तर विद्यमान रहता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥२०॥
मन एव मनुष्याणां भेदाभेदस्य कारणम्।
विकल्पनैव संकल्पो जीवन्मुक्तः स उच्यते॥२१॥
विकल्प और संकल्पात्मक मन ही मनुष्योंके भेद और ऐक्यका
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हेतु है, जो ऐसा जानता है (और मनके पार चला जाता है), वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ २१ ॥
मन एव विदुः प्राज्ञाः सिद्धसिद्धान्त एव च ।
सदा दृढं तदा मोक्षो जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ २२ ॥
विद्वानोंने मनको ही जान लिया है। सिद्ध-सिद्धान्त भी यही है कि (साधनामें) मनकी दृढ़तासे ही मोक्ष प्राप्त होता है। जिसने इस सत्यको जान लिया, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ २२ ॥
योगाभ्यासी मनःश्रेष्ठो अन्तस्त्यागी बहिर्जडः ।
अन्तस्त्यागी बहिस्त्यागी जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ २३ ॥
मनसे अन्तर्वृत्तियोंका त्याग और बाह्यवृत्तियोंकी उपेक्षा करनेवाला योगाभ्यासी श्रेष्ठ है, किंतु अन्तः और बाह्य—दोनों वृत्तियोंका मनसे त्याग करनेवाला ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ २३ ॥
॥ इति श्रीमद्दत्तात्रेयकृता जीवन्मुक्तगीता सम्पूर्णा ॥
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