गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in contextजीवन्मुक्तगीता
[ वेदान्तसारसे ओत-प्रोत अत्यन्त लघुकलेवरवाली जीवन्मुक्तगीता श्रीदत्तात्रेयजीकी रचना है, जिसमें अत्यन्त संक्षिप्त, पर सारगर्भित ढंगसे सहज-सुबोध दृष्टान्तोंद्वारा जीव तथा ब्रह्मके एकत्वका प्रतिपादन किया गया है, साथ ही जीवन्मुक्त-अवस्थाको भी सम्यक् रूपसे परिभाषित किया गया है। इसी साधकोपयोगी गीताको यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है— ]
जीवन्मुक्तिश्च या मुक्तिः सा मुक्तिः पिण्डपातने।
या मुक्तिः पिण्डपातेन सा मुक्तिः शुनि शूकरे॥ १॥
अपने शरीरकी आसक्तिका त्याग (देहबुद्धिका त्याग) ही वस्तुतः जीवन्मुक्ति है। शरीरके नाश होनेपर शरीरसे जो मुक्ति (मृत्यु) होती है, वह तो कूकर-शूकर आदि समस्त प्राणियोंको भी प्राप्त ही है॥ १॥
जीवः शिवः सर्वमेव भूतेष्वेवं व्यवस्थितः।
एवमेवाभिपश्यन् हि जीवन्मुक्तः स उच्यते॥ २॥
शिव (परमात्मा) ही सभी प्राणियोंमें जीवरूपसे विराजमान हैं—इस प्रकार देखनेवाला अर्थात् सर्वत्र भगवद्दर्शन करनेवाला मनुष्य ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥ २॥
एवं ब्रह्म जगत्सर्वमखिलं भासते रविः।
संस्थितं सर्वभूतानां जीवन्मुक्तः स उच्यते॥ ३॥
जिस प्रकार सूर्य समस्त ब्रह्माण्डमण्डलको प्रकाशित करता रहता है, उसी प्रकार चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म समस्त प्राणियोंमें प्रकाशित होकर सर्वत्र व्याप्त है। इस ज्ञानसे परिपूर्ण मनुष्य ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥ ३॥