गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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हो जाता है और जो चतुर्थीके दिन इसे भक्तिसे पढ़ता है, वह भी मुक्त हो जाता है॥ ४७॥
तत्तत्क्षेत्रं समासाद्य स्नात्वाभ्यर्च्य गजाननम्।
सकृद्गीतां पठन् भक्त्या ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ४८॥
उन-उन पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर स्नानकर गणेशजीका पूजनकर एक बार भी भक्तिपूर्वक इस गीताका पाठ करनेवाला ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है॥ ४८॥
भाद्रे मासे सिते पक्षे चतुर्थ्यां भक्तिमान्नरः।
कृत्वा महीमयीं मूर्तिं गणेशस्य चतुर्भुजाम्॥ ४९॥
सवाहनां सायुधां च समभ्यर्च्य यथाविधि।
यः पठेत्सप्तकृत्वस्तु गीतामेतां प्रयत्नतः॥ ५०॥
ददाति तस्य सन्तुष्टो गणेशो भोगमुत्तमम्।
पुत्रान् पौत्रान् धनं धान्यं पशुरत्नादिसम्पदः॥ ५१॥
भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थीके दिन भक्तिपूर्वक वाहन और आयुधसहित श्रीगणेशकी मृत्तिकाकी चतुर्भुज मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक पूजन करके जो यत्नपूर्वक सात बार इस गणेशगीताका पाठ करता है, उसपर सन्तुष्ट होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन-धान्य, पशु, रत्नादि सम्पत्ति और उत्तम भोग उसे प्रदान करते हैं॥ ४९-५१॥
विद्यार्थिनो भवेद्विद्या सुखार्थी सुखमाप्नुयात्।
कामानन्याँल्लभेत्कामी मुक्तिमन्ते प्रयान्ति ते॥ ५२॥
विद्यार्थीको विद्या, सुखार्थीको सुख, कामार्थीको कामकी प्राप्ति होती है और अन्तमें वे मुक्तिको प्राप्त होते हैं॥ ५२॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां त्रिविधवस्तुविवेक-
निरूपणयोगो नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥