गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- गणेशगीता * ८३
यो गीतां सम्यगभ्यस्य ज्ञात्वा चार्थं गुरोर्मुखात्।
कृत्वा पूजां गणेशस्य प्रत्यहं पठते तु यः॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं वापि यः पठेत्।
ब्रह्मीभूतस्य तस्यापि दर्शनान्मुच्यते नरः॥४२॥
जो इस गीताका भलीप्रकार अभ्यासकर तथा गुरुमुखसे इसका अर्थ जानकर गणेशजीकी पूजाकर प्रतिदिन एक काल, दो काल अथवा तीनों कालमें पाठ करता है, वह ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है और उसके दर्शनसे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है॥४१-४२॥
न यज्ञैर्न व्रतैर्दानैर्नाग्निहोत्रैर्महाधनैः।
न वेदैः सम्यगभ्यस्तैः सम्यग्ज्ञातैः सहाङ्गकैः॥४३॥
पुराणश्रवणैर्नैव न शास्त्रैः साधुचिन्तितैः।
प्राप्यते ब्रह्म परममनया प्राप्यते नरैः॥४४॥
न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन, न सांगोपांग वेदोंके उत्तम ज्ञान और अभ्यास, न पुराणोंके श्रवण, न भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रोंसे भी ऐसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, जैसे इस गीतासे मनुष्योंको प्राप्त होती है॥४३-४४॥
ब्रह्मघ्नो मद्यपस्तेयी गुरुतल्पगमोऽपि यः।
चतुर्णां यस्तु संसर्गी महापातककारिणाम्॥४५॥
स्त्रीहिंसागोवधादीनां कर्तारो ये च पापिनः।
ते सर्वे प्रतिमुच्यन्ते गीतामेतां पठन्ति चेत्॥४६॥
ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी तथा इन चारों महापाप करनेवालोंका साथ करनेवाले और स्त्रीहिंसा, गोवध आदि करनेवाले पापी भी इस गीताके पढ़नेसे पापमुक्त हो जाते हैं॥४५-४६॥
यः पठेत्प्रयतो नित्यं स गणेशो न संशयः।
चतुर्थ्यां च पठेद्भक्त्या सोऽपि मोक्षाय कल्पते॥४७॥
जो नियमसे इसे नित्य पढ़ता है, वह निःसन्देह श्रीगणेशस्वरूप