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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 76 of 675

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Page 76
  • गणेशगीता * ७५

आश्रय करो और तुम दृढ़ चित्तसे मेरी निरन्तर भक्ति करो ॥ १८ ॥
सापि भक्तिस्त्रिधा राजन् सात्त्विकी राजसी तमा।
यद्देवान् भजते भक्त्या सात्त्विकी सा मता शुभा ॥ १९ ॥
हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है, जिस भक्तिसे देवताओंका भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी सात्त्विकी भक्ति कही गयी है ॥ १९ ॥
राजसी सा तु विज्ञेया भक्तिर्जन्ममृतिप्रदा।
यद्यक्षाँश्चैव रक्षांसि यजन्ते सर्वभावतः ॥ २० ॥
जन्म-मृत्यु देनेवाली राजसी कही गयी भक्ति वह है, जिसमें सर्व भावसे यक्ष और राक्षसोंकी पूजा होती है ॥ २० ॥
वेदेनाविहितं क्रूरं साहङ्कारं सदम्भकम्।
भजन्ते प्रेतभूतादीन् कर्म कुर्वन्ति कामुकम् ॥ २१ ॥
शोषयन्तो निजं देहमन्तःस्थं मां दृढाग्रहाः।
तामस्येतादृशी भक्तिर्नृणां सा निरयप्रदा ॥ २२ ॥
वेदविधानसे रहित, क्रूर, अहंकार तथा दम्भसहित जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी भक्ति नरक देनेवाली है ॥ २१-२२ ॥
कामो लोभस्तथा क्रोधो दम्भश्चत्वार इत्यमी।
महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ॥ २३ ॥
काम, लोभ, क्रोध, दम्भ—ये नरकके चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां उपदेशयोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥