गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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* गीता-संग्रह *
प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय दुःखको भोगते हैं ॥ १२॥
दैवान्निःसृत्य नरकाज्जायन्ते भुवि कुब्जकाः।
जात्यन्धाः पङ्गवो दीना हीनजातिषु ते नृप॥१३॥
हे राजन्! कदाचित् दैववश नरकसे निकलकर पृथ्वीमें जन्म लेते हैं तो वे कुबड़े होते हैं या जन्मान्ध, लँगड़े, दीन और हीन जातिमें जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥
पुनः पापसमाचारा मय्यभक्ताः पतन्ति ते।
उत्पतन्ति हि मद्भक्ता यां काञ्चिद्योनिमाश्रिताः ॥ १४ ॥
पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करनेवाले पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी योनिमें जन्म लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥
लभन्ते स्वर्गतिं यज्ञैरन्यैर्धर्मैश्च भूमिप।
सुलभा सा सकामानां मयि भक्तिः सुदुर्लभा॥१५॥
हे राजन्! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है, जो सकामी पुरुषोंको सुलभ है, परंतु मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥
विमूढा मोहजालेन बद्धाः स्वेन च कर्मणा।
अहं हन्ता अहं कर्ता अहं भोक्तेति वादिनः ॥ १६ ॥
मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बन्धनमें पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ— ऐसा कहा करते हैं ॥ १६ ॥
अहमेवेश्वरः शास्ता अहं वेत्ता अहं सुखी।
एतादृशी मतिर्नृणामधः पातयतीह तान्॥ १७॥
मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं जाननेवाला, मैं सुखी हूँ—इस प्रकारकी मति मनुष्योंको नरकमें ले जाती है ॥ १७ ॥
तस्मादेतत्त्समुत्सृज्य दैवीं प्रकृतिमाश्रय।
भक्तिं कुरु मदीयां त्वमनिशं दृढचेतसा ॥ १८ ॥
इस कारण इस (तामसी प्रकृति)-को छोड़कर दैवी प्रकृतिका