गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अवधूतगीता (१) * ६१७
भगेन चर्मकुण्डेन दुर्गन्धेन व्रणेन च।
खण्डितं हि जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥१९॥
दुर्गन्धयुक्त तथा घावसदृश चर्मकुण्डरूप स्त्रीभगके द्वारा देवता, असुर तथा मानवसहित सम्पूर्ण जगत् विनाशको प्राप्त हुआ है॥१९॥
देहार्णवे महाघोरे पूरितं चैव शोणितम्।
केनापि निर्मिता नारी भगं चैव अधोमुखम् ॥२०॥
नारीके महाभयंकर देहरूप समुद्रमें रक्त भरा हुआ है। भला किसने नारीकी रचना कर दी और उसकी योनिको अधोमुख बना दिया॥२०॥
अन्तरे नरकं विद्धि कौटिल्यं बाह्यमण्डितम्।
ललितामिह पश्यन्ति महामन्त्रविरोधिनीम् ॥२१॥
स्त्रीके देहके भीतर नरक विद्यमान है—ऐसा जानो; जो कुटिलतासे युक्त है, किंतु बाहरसे शोभायुक्त लगता है। बुद्धिमान् (लोग) इस लोकमें स्त्रीको महामन्त्रस्वरूप वैराग्यका शत्रु समझते हैं॥२१॥
अज्ञात्वा जीवितं लब्धं भवस्तत्रैव देहिनाम्।
अहो जातो रतस्तत्र अहो भवविडम्बना ॥२२॥
आत्माको न जान करके ही मनुष्यने पुनः जन्म प्राप्त किया; देहधारियोंका जन्म उसी स्त्रीसे हुआ। महान् आश्चर्य है कि वह पुनः उसीमें आसक्त हो गया; अहो, संसारकी ऐसी विडम्बना है॥२२॥
तत्र मुग्धा रमन्ते च सदेवासुरमानवाः।
ते यान्ति नरकं घोरं सत्यमेव न संशयः ॥२३॥
देवता, असुर तथा मानवसमेत सभी मूढ़ बुद्धिवाले लोग उसी स्त्रीमें रमण करते हैं और [परिणामस्वरूप] वे घोर नरकमें जाते हैं, यह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है॥२३॥