गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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कौटिल्यदम्भसंयुक्ता सत्यशौचविवर्जिता।
केनापि निर्मिता नारी बन्धनं सर्वदेहिनाम्॥१४॥
कुटिलता तथा दम्भसे युक्त और सत्य तथा पवित्रतासे रहित एवं सभी देहधारियोंकी बन्धनस्वरूपा नारीको किसने बना दिया ? ॥ १४ ॥
त्रैलोक्यजननी धात्री सा भगी नरकं ध्रुवम्।
तस्यां जातो रतस्तत्र हा हा संसारसंस्थितिः॥१५॥
जो स्त्री तीनों लोकोंकी जननी और पोषण करनेवाली है, वह भगयुक्त होनेसे निश्चय ही साक्षात् नरक है। उसी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य पुनः उसीका भोग करता है, महान् खेद है कि संसारकी यही स्थिति है॥ १५ ॥
जानामि नरकं नारीं ध्रुवं जानामि बन्धनम्।
यस्यां जातो रतस्तत्र पुनस्तत्रैव धावति॥१६॥
मैं स्त्रीको [साक्षात्] नरक समझता हूँ और इसे निश्चितरूपसे बन्धन मानता हूँ; क्योंकि स्त्रीसे उत्पन्न हुआ मनुष्य उसीमें आसक्त हो जाता है और बार-बार उसीकी ओर दौड़ता है॥ १६ ॥
भगादिकुचपर्यन्तं संविद्धि नरकार्णवम्।
ये रमन्ति पुनस्तत्र तरन्ति नरकं कथम्॥१७॥
योनिसे लेकर स्तनपर्यन्त स्त्रीको नरकका समुद्र समझो। जो लोग [उसीसे उत्पन्न होकर] पुनः उसीमें रमण करते हैं, वे नरकको किस प्रकार तर सकते हैं ? ॥ १७ ॥
विष्ठादिनरकं घोरं भगं च परिनिर्मितम्।
किमु पश्यसि रे चित्त कथं तत्रैव धावसि॥१८॥
स्त्रीकी योनि विष्ठा आदिसे युक्त घोर नरकस्वरूप बनायी गयी है। हे चित्त ! तुम उसे क्यों देखते हो और उसकी ओर क्यों दौड़ते हो ? ॥ १८ ॥