गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* भगवतीगीता *
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शशिकोटिप्रभं चारुचन्द्रार्धकृतशेखरम्।
त्रिशूलवरहस्तं च जटामण्डितमस्तकम्॥ २३॥
भयानकं घोररूपं कालानलसहस्रभम्।
पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं च नागयज्ञोपवीतिनम्॥ २४॥
द्वीपिचर्माम्बरधरं नागेन्द्रकृतभूषणम्।
एवं विलोक्य तद्रूपं विस्मितो हिमवान् पुनः॥ २५॥
उनका वह ज्योतिर्मय रूप करोड़ों चन्द्रमाओंकी प्रभासे युक्त था, उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रकी सुन्दर लेखा विराजमान थी। उनके हाथमें श्रेष्ठ त्रिशूल और मस्तकपर जटाएँ सुशोभित हो रही थीं। हजारों कालाग्निकी आभाके समान उनका रूप भयानक और उग्र था। उनके पाँच मुख और तीन नेत्र थे तथा उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। इस प्रकार व्याघ्रचर्मको धारण किये हुए तथा श्रेष्ठ सर्पोंके आभूषणसे सुशोभित उनके उस रूपको देखकर हिमवान् बड़े चकित हुए॥ २३-२५॥
प्रोवाच वचनं माता रूपमन्यत्प्रदर्शय।
ततः संहृत्य तद्रूपं दर्शयामास तत्क्षणात्॥ २६॥
रूपमन्यन्मुनिश्रेष्ठ विश्वरूपा सनातनी।
शरच्चन्द्रनिभं चारुमुकुटोज्ज्वलमस्तकम्॥ २७॥
शङ्खचक्रगदापद्महस्तं नेत्रत्रयोज्ज्वलम्।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्॥ २८॥
योगीन्द्रवृन्दसंवन्द्यं सुचारुचरणाम्बुजम्।
सर्वतः पाणिपादं च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्॥ २९॥
दृष्ट्वा तदेतत्परमं रूपं स हिमवान् पुनः।
प्रणम्य तनयां प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ ३०॥
तब उनकी माँ मेनाने कहा कि मुझे अपना दूसरा रूप दिखाइये,