गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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पुण्यगन्धो ववौ वायुः प्रसन्नाश्च दिशो दश।
तथाद्रिराजः श्रुत्वा तु पुत्रीं जातां शुभाननाम्॥८॥
तरुणादित्यकोट्याभां त्रिनेत्रां दिव्यरूपिणीम्।
अष्टहस्तां विशालाक्षीं चन्द्रार्धकृतशेखराम्॥९॥
मेने तां प्रकृतिं सूक्ष्मामाद्यां जातां स्वलीलया।
तदा हृष्टमना भूत्वा विप्रेभ्यो प्रददौ बहु॥१०॥
धनं वासांसि च मुने दोग्ध्रीर्गाश्च सहस्रशः।
द्रष्टुं प्रतिययौ चाशु बन्धुभिः परिवारितः॥११॥
दसों दिशाओंमें प्रकाश फैल गया और सुगन्धित वायु बहने लगी। जब पर्वतराजने सुना कि उनके यहाँ सुन्दर कन्याने जन्म लिया है, जो करोड़ों मध्याह्नकालीन सूर्यके समान तेजस्विनी, तीन नेत्रोंवाली, दिव्यस्वरूपा, बड़ी-बड़ी आँखोंवाली, आठ भुजाओंसे युक्त और मस्तकपर अर्धचन्द्रको धारण किये है तो उन्होंने जान लिया कि सूक्ष्मा परा-प्रकृतिने ही अपनी लीलासे उनके यहाँ अवतार ग्रहण किया है। मुने! उन्होंने हर्षित होकर ब्राह्मणोंको प्रचुर धन, वस्त्र और हजारों दुधार गौएँ प्रदान कीं। तत्पश्चात् वे बन्धु-बान्धवोंसहित शीघ्र ही कन्याको देखने पहुँचे॥८—११॥
ततस्तमागतं ज्ञात्वा गिरीन्द्रं मेनका तदा।
प्रोवाच तनयां पश्य राजन् राजीवलोचनाम्॥१२॥
आवयोस्तपसा जाता सर्वभूतहिताय च।
ततः सोऽपि निरीक्ष्यैनां ज्ञात्वा तां जगदम्बिकाम्॥१३॥
प्रणम्य शिरसा भूमौ कृताञ्जलिपुटः स्थितः।
प्रोवाच वचनं देवीं भक्त्या गद्गदया गिरा॥१४॥
गिरिराजको आया जानकर मेनाने उनसे कहा—राजन्! अपनी कमलनयनी पुत्रीको देखिये, ये हम दोनोंकी तपस्याका फल हैं और