गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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है और मेरे स्वभावानुरूप होता है। हे हनुमान्! समय आनेपर मैं ही उस समस्त जगत्की सृष्टि और संहार करता हूँ—ये दोनों स्थितियाँ मेरी ही हैं। मैं ही आदि-मध्य और अन्तसे रहित तथा मायातत्त्वका संचालक हूँ॥ ५-६ ॥
क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ।
ताभ्यां सञ्जायते सर्वं संयुक्ताभ्यां परस्परम्॥ ७॥
मैं सृष्टिके प्रारम्भमें प्रकृति और पुरुषमें क्षोभ उत्पन्न करता हूँ। उनके परस्पर मेलसे ही सब उत्पन्न होता है॥ ७॥
महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृम्भितम्।
यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः॥ ८ ॥
हिरण्यगर्भो मार्तण्डः सोऽपि मद्देहसम्भवः।
तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं ज्ञानयोगं सनातनम्॥ ९ ॥
दत्तवानात्मजान् वेदान् कल्पादौ चतुरः किल।
स मन्नियोगतो ब्रह्मा सदा मद्भावभावितः॥ १०॥
महदादिके (पूर्वोक्त) क्रमसे मेरा ही तेज प्रकाशित होता है। जो सारे संसारका साक्षी, कालचक्रका नियन्ता, हिरण्यगर्भ सूर्य है, वह भी मेरे ही शरीरसे उत्पन्न हुआ है। उसको मैंने अपना दिव्य ऐश्वर्य तथा सनातन ज्ञानयोग प्रदान किया है। अपनेसे उपन्न चारों वेद भी कल्पके आरम्भमें मैंने प्रदान किये। ब्रह्मा मेरे अनुशासनमें सदा मेरे अनुकूल रहते हैं॥ ८—१०॥
दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम्।
स सर्वलोकनिर्माता मन्नियोगेन सर्ववित्।
भूत्वा चतुर्मुखः सर्गं सृजत्येवात्मसम्भवः॥ ११॥
वे मेरे उस दिव्य ऐश्वर्यको सदा स्वयं धारण करते हैं। वे सर्वज्ञ ब्रह्मा मेरे आदेशानुसार सभी लोकोंका निर्माण करते हैं। वे चतुर्मुख स्वरूपसे स्वयम्भू होकर सारी सृष्टिकी रचना करते हैं॥ ११॥