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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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  • रामगीता ( २ ) * ४१९

चौथा अध्याय

भगवान् श्रीरामद्वारा हनुमान्जीसे अपने परमात्मस्वरूपका वर्णन

सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता।
सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं सनातनः॥ १॥

[भगवान् श्रीराम कहते हैं—] मैं सभी लोकोंका एकमात्र स्रष्टा, पालक, संहारक, सर्वात्मा और सनातन हूँ॥ १॥

सर्वेषामेव वस्तूनामन्तर्यामी पिता ह्यहम्।
मय्येवान्तःस्थितं सर्वं चाहं सर्वत्र संस्थितः॥ २॥

सभी वस्तुओंके भीतर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा तथा सबका पिता मैं ही हूँ। मुझमें ही सारे (प्राणी-पदार्थ) स्थित रहते हैं और मैं भी उन सबमें स्थित रहता हूँ॥ २॥

भवता चाद्भुतं दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम्।
ममैषा ह्युपमा वत्स मायया दर्शिता मया॥ ३॥

हे वत्स! तुमने जो मेरा अद्भुत स्वरूप देखा है, उसे मेरे समान जानो, उसे मैंने ही मायापूर्वक तुम्हें दिखाया है॥ ३॥

सर्वेषामेव भावानामान्तरा समवस्थितः।
प्रेरयामि जगत्सर्वं क्रियाशक्तिरियं मम॥ ४॥

सभी प्राणियोंके अन्तःस्थित होकर मैं सारे संसारको कार्यमें प्रेरित करता हूँ—यह मेरी क्रियाशक्ति है॥ ४॥

मयेदं चेष्टते विश्वं मत्स्वभावानुवर्ति च।
सोऽहं काले जगत्कृत्स्नं करोमि हनुमन् किल॥ ५॥
संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव तु।
आदिमध्यान्तनिर्मुक्तो मायातत्त्वप्रवर्तकः॥ ६॥

संसारमें जो भी क्रियाकलाप होता है, वह मेरे द्वारा ही संचालित