गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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योगी अनिच्छासे कर्म करे तो वह ब्रह्म ही हो जाता है॥६॥
निर्मलो यतचित्तात्मा जितगो योगतत्परः।
आत्मानं सर्वभूतस्थं पश्यन् कुर्वन्न लिप्यते ॥७॥
शुद्धचित्त, मनको वशमें करनेवाले, जितेन्द्रिय, योगमें तत्पर और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेवाले कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते ॥७॥
तत्त्वविद्योगयुक्तात्मा करोमीति न मन्यते।
एकादशानीन्द्रियाणि कुर्वन्ति कर्म संख्यया ॥८॥
तत्त्वको जाननेवाला योगयुक्त आत्मवान् पुरुष 'मैं कर्ता हूँ', ऐसा नहीं मानता, अपितु मनसहित एकादश इन्द्रियाँ कर्म करती हैं, ऐसा मानता है ॥८॥
तत्सर्वमर्पयेद्ब्रह्मण्यपि कर्म करोति यः।
न लिप्यते पुण्यपापैर्भानुर्जलगतो यथा ॥९॥
जो कर्म करनेवाला सारे कर्म ब्रह्ममें अर्पण कर देता है, वह उसी प्रकार पाप-पुण्यसे लिप्त नहीं होता, जैसे जलमें पड़ा हुआ सूर्यका बिम्ब उससे लिप्त नहीं होता ॥९॥
कायिकं वाचिकं बौद्धमैन्द्रियं मानसं तथा।
त्यक्त्वाशां कर्म कुर्वन्ति योगज्ञाश्चित्तशुद्धये ॥१०॥
योगके जाननेवाले चित्तशुद्धिके निमित्त आशा (फलाशा)-का त्यागकर शरीर, वचन, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे कर्म करते हैं ॥१०॥
योगहीनो नरः कर्म फलेहया करोत्यलम्।
बध्यते कर्मबीजैः स ततो दुःखं समश्नुते ॥११॥
योगहीन मनुष्य कर्मोंको फलकी इच्छासे करता है, वह कर्मबीजसे बँध जाता है और इसीसे दुःखको प्राप्त होता है ॥११॥