गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- गणेशगीता * ३९
कारण कहकर फिर कर्मयोगको ज्ञानका कारण कहते हैं, इन दोनोंमें जो हितकारी हो, उसे कहिये ॥ १ ॥
श्रीगजानन उवाच
क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने।
तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते ॥ २ ॥
श्रीगणेशजी बोले—(अधिकारियोंके भेदसे) कर्मयोग और कर्मसंन्यास दोनों ही मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्मसंन्याससे कर्मयोगमें विशेषता है॥ २॥
द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न काङ्क्षति किञ्चन।
मुच्यते बन्धनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान् सुखम् ॥ ३ ॥
जो द्वन्द्व और दुःखको सहकर किसीसे द्वेष नहीं करता और किसी बातकी इच्छा नहीं करता, ऐसा प्राणी अनायास तत्काल कर्मबन्धनसे सदा मुक्त हो जाता है॥ ३॥
वदन्ति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसङ्ग्रहौ।
मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं सयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥
कर्मसंन्यास और कर्मयोगको मूढ़ और अज्ञानी ही पृथक्-पृथक् कहते हैं, परंतु पण्डितगण उन्हें एक ही मानते हैं॥ ४॥
यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम्।
सङ्ग्रहं कर्मणो योगं यो विन्दति स विन्दति ॥ ५ ॥
जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो एक जानता है, वही यथार्थ ज्ञाता है॥ ५॥
केवलं कर्मणां न्यासं संन्यासं न विदुर्बुधाः।
कुर्वन्ननिच्छया कर्म योगी ब्रह्मैव जायते ॥ ६ ॥
पण्डितजन केवल कर्मके संन्यासको ही संन्यास नहीं कहते, यदि