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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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३३८ * गीता-संग्रह *


वैशम्पायन उवाच

कृष्णेन सहितः पार्थः स्वराज्यं प्राप्य केवलम्।
तस्यां सभायां दिव्यायां विजहार मुदा युतः॥ २॥

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! श्रीकृष्णके सहित अर्जुनने जब केवल अपने राज्यपर पूरा अधिकार प्राप्त कर लिया, तब वे उस दिव्य सभाभवनमें आनन्दपूर्वक रहने लगे॥ २॥

तत्र कञ्चित् सभोद्देशं स्वर्गोद्देशसमं नृप।
यदृच्छया तौ मुदितौ जग्मतुः स्वजनावृतौ॥ ३॥

नरेश्वर! एक दिन वहाँ स्वजनोंसे घिरे हुए वे दोनों मित्र स्वेच्छासे घूमते-घामते सभामण्डपके एक ऐसे भागमें पहुँचे, जो स्वर्गके समान सुन्दर था॥ ३॥

ततः प्रतीतः कृष्णेन सहितः पाण्डवोऽर्जुनः।
निरीक्ष्य तां सभां रम्यामिदं वचनमब्रवीत्॥ ४॥

पाण्डुनन्दन अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णके साथ रहकर बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने एक बार उस रमणीय सभाकी ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—॥ ४॥

विदितं मे महाबाहो सङ्ग्रामे समुपस्थिते।
माहात्म्यं देवकीमातस्तच्च ते रूपमैश्वरम्॥ ५॥

महाबाहो! देवकीनन्दन जब संग्रामका समय उपस्थित था, उस समय मुझे आपके माहात्म्यका ज्ञान और ईश्वरीय स्वरूपका दर्शन हुआ था॥ ५॥

यत् तद् भगवता प्रोक्तं पुरा केशव सौहृदात्।
तत् सर्वं पुरुषव्याघ्र नष्टं मे भ्रष्टचेतसः॥ ६॥

किंतु केशव! आपने सौहार्दवश पहले मुझे जो ज्ञानका उपदेश दिया था, मेरा वह सब ज्ञान इस समय विचलितचित्त हो जानेके कारण नष्ट हो गया (भूल गया) है॥ ६॥