Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

Page 338 of 675

Read in context
Page 338

उत्तरगीता

[उत्तरगीता महाभारतके आश्वमेधिक पर्वके अन्तर्गत अनुगीता नामक उपपर्वमें मिलती है। लघुकाय होते हुए भी तात्त्विक दृष्टिसे यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कुरुक्षेत्रमें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको भगवद्गीतारूपी जो ज्ञानोपदेश दिया था, उसका कालान्तरमें अर्जुनको विस्मरण हो गया। भगवान् श्रीकृष्णने भी योगयुक्त होकर व्यक्त किये गये उस ज्ञानका पुनः पूरा-पूरा स्मरण असम्भव ही बताया, परंतु अर्जुनके कल्याणार्थ उत्तम गति प्रदान करनेमें सक्षम उसी परमात्मतत्त्वको भिन्नरूपसे वर्णित किया, उसीको उत्तरगीता कहते हैं। जीवको शुभ-अशुभ सभी कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है, अतएव सत्कर्म ही करें—ऐसी प्रेरणा देनेके साथ ही जीवकी विभिन्न गतियाँ तथा मोक्षप्राप्तिके उपायोंका वर्णन भी इसमें किया गया है। यही सारगर्भित तथा सुबोध तात्त्विक विवेचनयुक्त उत्तरगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है—]

पहला अध्याय

अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना

जनमेजय उवाच

सभायां वसतोस्तत्र निहत्यारीन् महात्मनोः।
केशवार्जुनयोः का नु कथा समभवद् द्विज॥ १॥

**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! शत्रुओंका नाश करके जब महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन सभाभवनमें रहने लगे, उन दिनों उन दोनोंमें क्या-क्या बातचीत हुई?॥ १॥