Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished675 pages

Page 33 of 675

Read in context
Page 33

३२ * गीता-संग्रह *


निरीहा निर्भयारोषा मत्परा मद्व्यपाश्रयाः।
विज्ञानतपसा शुद्धा अनेके मामुपागताः॥१४॥

इच्छारहित, निर्भय, क्रोधहीन, मुझमें ही आश्रित, मेरी ही उपासना करनेवाले विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर अनेक प्राणी मुझको प्राप्त हो गये हैं॥१४॥

येन येन हि भावेन संसेवन्ते नरोत्तमाः।
तथा तथा फलं तेभ्यः प्रयच्छाम्यव्ययः स्फुटम्॥१५॥

श्रेष्ठजन जिस-जिस भावसे मेरा सेवन करते हैं, मैं अविनश्वर उनको वैसा फल निश्चय ही देता हूँ॥१५॥

जनाः स्युरितरे राजन् मम मार्गानुयायिनः।
तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते॥१६॥

हे राजन्! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी हो जायँ, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें करते हैं॥१६॥

कुर्वन्ति देवताप्रीतिं काङ्क्षन्तः कर्मणां फलम्।
प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम्॥१७॥

जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवोपासना करते हैं, उन-उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है॥१७॥

चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोऽशतः।
कर्माशितश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयानघ॥१८॥

हे पापरहित! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व, रज, तम—इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है॥१८॥

कर्तारमपि तेषां मामकर्तारं विदुर्बुधाः।
अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः॥१९॥

यद्यपि मैं इनका कर्ता हूँ, परंतु पण्डितजन मुझे अकर्ता जानते