Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished675 pages

Page 32 of 675

Read in context
Page 32

* गणेशगीता * ३१

अहमेव परो ब्रह्मा महारुद्रोऽहमेव च।
अहमेव जगत्सर्वं स्थावरं जङ्गमं च यत्॥ ८॥
मैं ही श्रेष्ठ ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ॥ ८॥

अजोऽव्ययोऽहं भूतात्मानादिरीश्वर एव च।
आस्थाय त्रिगुणां मायां भवामि बहुयोनिषु॥ ९॥
मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवोंका आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक मायामें स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ॥ ९॥

अधर्मोपचयो धर्मापचयो हि यदा भवेत्।
साधून् संरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं सम्भवाम्यहम्॥ १०॥
जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंको मारनेके लिये मैं अवतार लेता हूँ॥ १०॥

उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च।
हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा॥ ११॥
मैं अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका स्थापन करता हूँ और अनेक प्रकारकी लीलाकर आनन्दसे दुष्टों तथा दैत्योंका वध करता हूँ॥ ११॥

वर्णाश्रमान् मुनीन् साधून् पालये बहुरूपधृक्।
एवं यो वेत्ति सम्भूतिर्मम दिव्या युगे युगे॥ १२॥
तत्तत्कर्म च वीर्यं च मम रूपं समासतः।
त्यक्त्वाहं ममताबुद्धिं न पुनर्भूः स जायते॥ १३॥
अनेक रूप धारणकर मैं वर्ण, आश्रम, मुनि और साधुओंका पालन करता हूँ, इस प्रकारसे जो युग-युगमें मेरी दिव्य विभूतिको, मेरे कर्म, वीर्य और रूपको जानता है तथा अहंकार और ममताबुद्धिका त्याग कर देता है, वह मुक्त हो जाता है॥ १२-१३॥