गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 326 of 675
Read in context- नारदगीता * ३२५
श्रान्त होकर असफल होते देखे जाते हैं॥ १०॥
अपरे बालिशाः सन्तो निर्गुणाः पुरुषाधमाः।
आशीर्भीरप्यसंयुक्ता दृश्यन्ते सर्वकामिनः॥ ११॥
किंतु दूसरे मूर्ख, गुणहीन और अधम मनुष्य भी किसीका आशीर्वाद न मिलनेपर भी सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न दिखायी देते हैं॥ ११॥
भूतानामपरः कश्चिद्धिंसायां सततोत्थितः।
वञ्चनायां च लोकस्य स सुखेष्वेव जीर्यते॥ १२॥
कोई-कोई मनुष्य तो सदा प्राणियोंकी हिंसामें ही लगा रहता है और सब लोगोंको धोखा दिया करता है तो भी वह सुख ही भोगते-भोगते बूढ़ा होता है॥ १२॥
अचेष्टमानमासीनं श्रीः कञ्चिदुपतिष्ठते।
कश्चित् कर्मानुसृत्यान्यो न प्राप्यमधिगच्छति॥ १३॥
कितने ही ऐसे हैं, जो कोई काम न करके चुपचाप बैठे रहते हैं, फिर भी लक्ष्मी उनके पास अपने-आप पहुँच जाती है और कुछ लोग काम करके भी अपनी प्राप्य वस्तुको उपलब्ध नहीं कर पाते॥ १३॥
अपराधं समाचक्ष्व पुरुषस्य स्वभावतः।
शुक्रमन्यत्र सम्भूतं पुनरन्यत्र गच्छति॥ १४॥
इसमें स्वभावतः पुरुषका ही अपराध (प्रारब्ध-दोष) समझो। वीर्य अन्यत्र उत्पन्न होता है और सन्तानोत्पादनके लिये अन्यत्र जाता है॥ १४॥
तस्य योनौ प्रयुक्तस्य गर्भो भवति वा न वा।
आम्रपुष्पोपमा यस्य निवृत्तिरुपलभ्यते॥ १५॥
कभी तो वह योनिमें पहुँचकर गर्भ धारण करानेमें समर्थ होता