गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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स्रवन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितामिव।
आयुरादाय मर्त्यानां रात्र्यहानि पुनः पुनः॥ ५॥
जैसे नदियोंका प्रवाह आगेकी ओर ही बढ़ता चला जाता है, पीछेकी ओर नहीं लौटता, उसी प्रकार रात और दिन भी मनुष्योंकी आयुका अपहरण करते हुए बारम्बार आते और बीतते चले जाते हैं॥ ५॥
व्यत्ययो ह्ययमत्यन्तं पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः।
जातान् मर्त्याञ्जरयति निमेषान् नावतिष्ठते॥ ६॥
शुक्ल और कृष्ण—दोनों पक्षोंका निरन्तर होनेवाला यह परिवर्तन मनुष्योंको जराजीर्ण कर रहा है। यह कुछ क्षणके लिये भी विश्राम नहीं लेता है॥ ६॥
सुखदुःखानि भूतानामजरो जरयत्यसौ।
आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनः पुनरुदेति च॥ ७॥
सूर्य प्रतिदिन अस्त होते और फिर उदय लेते हैं। वे स्वयं अजर होकर भी प्रतिदिन प्राणियोंके सुख और दुःखको जीर्ण करते रहते हैं॥ ७॥
अदृष्टपूर्वानादाय भावानपरिशङ्कितान्।
इष्टानिष्टान् मनुष्याणामस्तं गच्छन्ति रात्रयः॥ ८॥
ये रात्रियाँ मनुष्योंके लिये कितनी ही अपूर्व तथा असम्भावित प्रिय-अप्रिय घटनाएँ लिये आती और चली जाती हैं॥ ८॥
योऽयमिच्छेद यथाकामं कामानां तदवाप्नुयात्।
यदि स्यान्न पराधीनं पुरुषस्य क्रियाफलम्॥ ९॥
यदि जीवके किये हुए कर्मोंका फल पराधीन न होता तो जो जिस वस्तुकी इच्छा करता, वह अपनी उसी कामनाको रुचिके अनुसार प्राप्त कर लेता॥ ९॥
संयताश्च हि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः।
दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः॥ १०॥
बड़े-बड़े संयमी, बुद्धिमान् और चतुर मनुष्य भी समस्त कर्मोंसे