गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* यमगीता ( १ )* २६१
यमराजने उसके कानमें कहा—भगवान् मधुसूदनके शरणागत व्यक्तियोंको छोड़ देना; क्योंकि मैं, जो विष्णुभक्त नहीं हैं—ऐसे अन्य पुरुषोंका ही स्वामी हूँ॥ १४॥
अहममरवरार्चितेन धात्रा
यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः।
हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः
प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः॥ १५॥
देव-पूज्य विधाताने मुझे ‘यम’ नामसे लोकोंके पाप-पुण्यका विचार करनेके लिये नियुक्त किया है। मैं अपने गुरु श्रीहरिके वशीभूत हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। भगवान् विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करनेमें समर्थ हैं॥ १५॥
कटकमुकुटकर्णिकादिभेदैः
कनकमभेदमपीष्यते यथैकम्।
सुरपशुमनुजादिकल्पनाभि-
र्हरिरखिलाभिरुदीर्यते तथैकः॥ १६॥
जिस प्रकार सुवर्ण भेदरहित और एक होकर भी कटक, मुकुट तथा कर्णिका आदिके भेदसे नानारूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार एक ही हरिका देवता, मनुष्य और पशु आदि नानाविध कल्पनाओंसे निर्देश किया जाता है॥ १६॥
क्षितितलपरमाणवोऽनिलान्ते
पुनरुपयान्ति यथैकतां धरित्र्याः।
सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते
गुणकलुषेण सनातनेन तेन॥ १७॥
जिस प्रकार वायुके शान्त होनेपर उसमें उड़ते हुए परमाणु पृथिवीसे मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार गुण-क्षोभसे उत्पन्न हुए समस्त