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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 261

२६० * गीता-संग्रह *

तेनाख्यातमिदं सर्वमित्थं चैतद्भवष्यिति ।
तथा च तदभूद्वत्स यथोक्तं तेन धीमता ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा— हे वत्स! पूर्वकालमें मेरे पास एक कलिंग-देशीय ब्राह्मण-मित्र आया और मुझसे बोला—‘मेरे पूछनेपर एक जातिस्मर मुनिने बतलाया था कि ये सब बातें अमुक-अमुक प्रकार ही होंगी।’ हे वत्स! उस बुद्धिमान्‌ने जो-जो बातें जिस-जिस प्रकार होनेको कही थीं, वे सब ज्यों-की-त्यों हुईं ॥ ९-१० ॥

स पृष्टश्च मया भूयः श्रद्दधानेन वै द्विजः।
यद्यदाह न तद्दृष्टमन्यथा हि मया क्वचित् ॥ ११ ॥
इस प्रकार उसमें श्रद्धा हो जानेसे मैंने उससे फिर कुछ और भी प्रश्न किये और उनके उत्तरमें उस द्विजश्रेष्ठने जो-जो बातें बतलायीं, उनके विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा ॥ ११ ॥

एकदा तु मया पृष्टमेतद्यद्भवतोदितम्।
प्राह कालिङ्गको विप्रस्स्मृत्वा तस्य मुनेर्वचः ॥ १२ ॥
जातिस्मरेण कथितो रहस्यः परमो मम।
यमकिङ्करयोर्योऽभूत्संवादस्तं ब्रवीमि ते ॥ १३ ॥
एक दिन, जो बात तुम मुझसे पूछते हो, वही मैंने उस कालिंग ब्राह्मणसे पूछी। उस समय उसने उस मुनिके वचनोंको याद करके कहा कि उस जातिस्मर ब्राह्मणने यम और उनके दूतोंके बीचमें जो संवाद हुआ था, वह अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था। वही मैं तुमसे कहता हूँ॥ १२-१३॥

कालिङ्ग उवाच

स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं
वदति यमः किल तस्य कर्णमूले।
परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्
प्रभुरहमन्यनृणामवैष्णवानाम् ॥ १४ ॥
कालिंग बोला— अपने अनुचरको हाथमें पाश लिये देखकर