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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 222 of 675

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Page 222

* वृत्रगीता * २२१


तमासीनं महाप्रज्ञमुशना वाक्यमब्रवीत्।
ब्रूह्यस्मै दानवेन्द्राय विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्॥ ५॥
जब महाज्ञानी सनत्कुमार आरामसे बैठ गये, तब शुक्राचार्यने उनसे कहा—‘भगवन्! आप इस दानवराजको भगवान् विष्णुका उत्तम माहात्म्य बताइये’॥ ५॥

सनत्कुमारस्तु ततः श्रुत्वा प्राह वचोऽर्थवत्।
विष्णोर्माहात्म्यसंयुक्तं दानवेन्द्राय धीमते॥ ६॥
यह सुनकर सनत्कुमारजीने बुद्धिमान् दानवराज वृत्रासुरके प्रति भगवान् विष्णुकी महिमासे युक्त यह सार्थक वचन कहा—॥ ६॥

शृणु सर्वमिदं दैत्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।
विष्णौ जगत् स्थितं सर्वमिति विद्धि परंतप॥ ७॥
शत्रुओंको सन्ताप देनेवाले दैत्य! भगवान् विष्णुका यह सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य सुनो—तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि यह समस्त संसार भगवान् विष्णुमें ही स्थित है॥ ७॥

सृजत्येष महाबाहो भूतग्रामं चराचरम्।
एष चाक्षिपते काले काले विसृजते पुनः॥ ८॥
पर महाबाहो! ये श्रीविष्णु ही सम्पूर्ण चराचर प्राणिसमुदायकी सृष्टि करते हैं और ये ही समय आनेपर उसका विनाश करते हैं एवं समय आनेपर पुनः सृष्टि भी करते हैं॥ ८॥

अस्मिन् गच्छन्ति विलयमस्माच्च प्रभवन्त्युत।
नैष ज्ञानवता शक्यस्तपसा नैव चेज्यया।
सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणां तु संयमेनैव शक्यते॥ ९॥
समस्त प्राणी इन्हींमें लयको प्राप्त होते हैं और इन्हींसे प्रकट भी होते हैं। इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञके द्वारा भी नहीं पा सकता। केवल इन्द्रियोंके संयमसे ही उनकी उपलब्धि हो सकती है॥ ९॥