गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context२२० * गीता-संग्रह *
दूसरा अध्याय
वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण
उशनोवाच
नमस्तस्मै भगवते देवाय प्रभविष्णवे।
यस्य पृथ्वीतलं तात साकाशं बाहुगोचरः॥ १॥
शुक्राचार्यने कहा—तात! आकाशसहित यह सारी पृथ्वी जिनकी भुजाओंके बलपर स्थित है, महान् प्रभावशाली उन भगवान् विष्णुदेवको नमस्कार है॥ १॥
मूर्धा यस्य त्वनन्तं च स्थानं दानवसत्तम।
तस्याहं ते प्रवक्ष्यामि विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्॥ २॥
दानवश्रेष्ठ! जिनका मस्तक और स्थान भी अनन्त है, उन भगवान् विष्णुका उत्तम माहात्म्य मैं तुम्हें बताऊँगा॥ २॥
तयोः संवदतोरेवमाजगाम महामुनिः।
सनत्कुमारो धर्मात्मा संशयच्छेदनाय वै॥ ३॥
शुक्राचार्य और वृत्रासुरमें ये बातें हो ही रही थीं कि वहाँ महामुनि धर्मात्मा सनत्कुमार उनके संशयका निवारण करनेके लिये आ पहुँचे॥ ३॥
स पूजितोऽसुरेन्द्रेण मुनिनोशनसा तथा।
निषसादासने राजन् महार्हे मुनिपुङ्गवः॥ ४॥
राजन्! असुरराज वृत्र और मुनि शुक्राचार्यके द्वारा पूजित हो मुनिवर सनत्कुमार एक बहुमूल्य सिंहासनपर विराजमान हुए॥ ४॥